Wednesday, 16 September 2020

आओं सच्चें हुसैनी बनें


 

🅿🄾🅂🅃 ➪  01

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     ❝ आओं  सच्चे  हुसैनी  बनें!❞
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 मुहम्मद की मोहब्बत दींने हक़ की शर्त अव्वल हैं!
 
 इसी में हो ग़र ख़ामी तो सब कुछ ना मुक़म्मल हैं!
❏ ••────•◦◦❈◦◦•────•• ❏


៚  *प्यारे इस्लामी भाइयों !* मज़हबे इस्लाम में एक अल्लाह की एबादत ज़रूरी है साथ ही साथ उसके नेक बंदों से मुहब्बत व अ़क़ीदत भी ज़रूरी है। अल्लाह के नेक अच्छे और मुक़द्दस बन्दों से अस़ली, सच्ची और ह़क़ीक़ी मुहब्बत तो यह है कि उन के ज़रीऐ अल्लाह ने जो रास्ता दिखाया है उस पर चला जाये ,उनका कहना माना जाये ,अपनी ज़िंदगी को उनकी ज़िंदगी की तरह बनाने की कोशिश की जाये ,इस के साथ साथ इस्लाम के दाइरे में रह कर उन की याद मनाना, उनका ज़िक्र और चर्चा करना, उनकी यादगारें क़ाइम करना भी मुहब्बत व अ़क़ीदत है!

៚  और अल्लाह के जितने भी नेक और बरगुज़ीदा बन्दे हैं उन सब के सरदार उसके आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हैं, उनका मर्तबा इतना बड़ा है कि वह अल्लाह के रसूल होने के साथ-साथ उसके महबूब भी हैं, और जिस को दीन व दुनिया में जो कुछ भी अल्लाह ने दिया, देता है, और देगा, सब उन्हीं का ज़रीआ, वसीला और सदक़ा है, उनका जब विसाल हुआ, और जब दुनिया से तशरीफ़ ले गये तो उन्होंने अपने क़रीबी दो तरह के लोग छोड़े थे, एक तो उनके साथी जिन्हें सहाबी कहते हैं, उनकी तादाद हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के विसाल के वक़्त एक लाख से भी ज्यादा थी, दूसरे हुज़ूर की आल व औलाद और आप की पाक 
बीवियां उन्हें अहले बैत कहते हैं।..✍🏻
 
                *⊆ ↬ बा - हवाला ↫ ⊇*

*📬 मुहर्रम में क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफह - 03 📚*

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     ❝ आओं  सच्चे  हुसैनी  बनें!❞
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 मुहम्मद की मोहब्बत दींने हक़ की शर्त अव्वल हैं!
 
 इसी में हो ग़र ख़ामी तो सब कुछ ना मुक़म्मल हैं!
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៚  हुज़ूरﷺ के इन सब क़रीबी लोगों से मुहब्बत रखना मुसलमान के लिए निहायत जरूरी है।

៚  हुज़ूरﷺ के अहले बैत हों या आप के सहाबी उन में से किसी को भी बुरा भला कहना या उनकी शान में गुस्ताख़ी और बे अदबी करना मुसलमान का काम नहीं है, ऐसा करने वाला गुमराह व बद दीन है उसका ठिकाना जहन्नम है।

៚  हुज़ूरﷺ के अहले बैत में एक बड़ी हस्ती इमाम आली मक़ाम सैयदिना इमाम हुसैन भी हैं उनका मर्तबा इतना बड़ा है कि वह हुज़ूर के सहाबी भी हैं, और अहले बैत में से भी हैं!

៚  यानी आप की प्यारी बेटी के प्यारे बेटे आप के प्यारे और चहीते नवासे हैं, रात-रात भर जाग कर अल्लाह की इबादत करने वाले और कुरआने अ़ज़ीम की तिलावत करने वाले मुत्तक़ी इबादत गुज़ार, परहेज गार, बुजुर्ग, अल्लाह के बहुत बड़े वली हैं।..✍🏻
 
                *⊆ ↬ बा - हवाला ↫ ⊇*

*📬 मुहर्रम में क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफह - 04 📚*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  03

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     ❝आओं  सच्चे  हुसैनी  बनें! ❞
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मुहम्मद की मोहब्बत दींने हक़ की शर्त अव्वल हैं!
 
 इसी में हो ग़र ख़ामी तो सब कुछ ना मुक़म्मल हैं!
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៚  साथ ही साथ मज़हबे इस्लाम के लिए राहे खुदा में गला कटाने वाले शहीद भी हैं, मुहर्रम के महीने की दस तारीख को जुमा के दिन 61, हिजरी में यानी हुज़ूर के विसाल के तक़रीबन पचास साल के बाद आप को और आप के साथियों और बहुत से घर वालों को ज़ालिमों ने ज़ुल्म कर के करबला नाम के एक मैदान में 3, दिन प्यासा रख कर शहीद कर दिया, इस्लामी तारीख का यह एक बड़ा सानिहा और दिल हिला देने वाला हादसा है, और दस मुहर्रम जो कि पहले ही से एक तारीख़ी और यादगार दिन था, इस हादसे ने इस को और भी ज़िन्दा व जावेद कर दिया, और उस दिन को हज़रत इमाम हुसैन के नाम से जाना जाने लगा।

៚  और गोया कि यह हुसैनी दिन हो गया, और बे शक़ ऐसा होना ही चाहिए, लेकिन मज़हबे इस्लाम एक सीधा सच्चा सन्जीदगी और शराफ़त वाला मज़हब है और उसकी हदें मुकर्रर हैं।

៚  लिहाजा इस में जो भी हो सब मज़हब और शरीअ़त के दाइरे में रह कर हो तभी वह इस्लामी बुजुर्गो की यादगार कहलायेगी और जब हमारा कोई भी तरीका मज़हब की लगाई चहार दीवारी से बाहर निकल गया तो वह ग़ैर इस्लामी और हमारी बुजुर्ग शख़्सियतों के लिए बाइसे बदनामी हो गया।..✍🏻
 
                *⊆ ↬ बा - हवाला ↫ ⊇*

*📬 मुहर्रम में क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफह - 05 📚*

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 इसी में हो ग़र ख़ामी तो सब कुछ ना मुक़म्मल हैं!
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៚  हम जैसा करेंगे हमें देख कर दूसरे मज़हबों के लोग यही समझेंगे कि इन के बुजुर्ग भी ऐसा करते होंगे, क्योंकि क़ौम अपने बुजुर्गो और पेशवाओं का तआरुफ़ होती है, हम अगर नमाज़े पढ़ेगे कुरआन की तिलावत करेंगे जूए शराब गाने बजाने और तमाशों से बच कर ईमान दार, शरीफ़ और भले आदमी बन कर रहेंगे, तो देखने वाले कहेंगे की जब यह इतने अच्छे हैं तो इनके बुज़ुर्ग कितने अच्छे होंगे!

៚  और जब हम इस्लाम के ज़िम्मेदार ठेकेदार बन कर इस्लाम और इस्लामी बुजुर्गो के नाम पर ग़ैर इन्सानी हरकतें नाच कूद और तमाशे करेंगे तो यक़ीनन जिन्होंने इस्लाम का मुतालअ नहीं किया है उन की नज़र में हमारे मज़हब का ग़लत तआरुफ़ होगा और फिर कोई क्यों मुसलमान बनेगा।

៚  हुसैनी दिन यानी दस मुहर्रम के साथ भी कुछ लोगों ने यही सब किया, और इमाम हुसैन के किरदार को भूल गए, और इस दिन को खेल तमाशों ग़ैर शरई रसूम नाच गानों, मेलों ठेलों और तफ़रीहों का दिन बना डाला।

៚  और ऐसा लगने लगा कि जैसे इस्लाम भी मआ़ज़ल्लाह दूसरे मजहबों की तरह खेल तमाशों तफ़रीहों और रंग रिलियों वाला मज़हब है।..✍🏻
 
                *⊆ ↬ बा - हवाला ↫ ⊇*

*📬 मुहर्रम में क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफह - 05 📚*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  05

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मुहम्मद की मोहब्बत दींने हक़ की शर्त अव्वल हैं!
 
 इसी में हो ग़र ख़ामी तो सब कुछ ना मुक़म्मल हैं!
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៚  ख़ुद को मुसलमान कहलाने वालों में एक नाम निहाद इस्लामी फ़िर्का ऐसा भी है कि उन के यहां नमाज़ रोज़े वगैरह अह़कामे शरअ़ और दीन दारी की बातों को तो कोई ख़ास अहमियत नहीं दी जाती बस मुहर्रम आने पर रोना पीटना, चीखना चिल्लाना, कपड़े फाड़ना, मातम व सीना कोबी करना ही उन का मज़हब है गोया कि उन के नज़दीक अल्ल्लाह तआ़ला ने अपने रसूल को इन्ही कामों को करने और सिखाने को भेजा था,और इन्ही सब बेकार बातों का नाम इस्लाम है।

៚  मज़हबे अहले सुन्नत वजमाअत में कुछ हिन्दुस्तान के पुराने ग़ैर मुस्लिमों जिन के यहां धर्म के नाम पर जूये खेले जाते हैं, शराबें पी जाती हैं, जगह जगह मेले लगा कर मर्दों, औरतों को जमा कर के ग़ैर इन्सानी हरकतें की जाती हैं, उनकी सोहबतों में रह कर उनके पास बैठने, उठने, रहने, सहने के नतीजे में खेल तमाशे और वाहियात भरे मेलों को ही इस्लाम समझने लगे, और बांस काग़ज़ और पन्नी के मुजस्समे बना कर उन पर चढ़ावे चढ़ाने लगे।

៚  दर असल होता यह है कि ऐसे काम कि जिन में लोगों को ख़ूब मज़ा और दिलचस्पी आये, तफ़रीह और चटख़ारे  मिलें उनका रिवाज अगर कोई डाले तो वह बहुत जल्दी पड़ जाता है और क़ौम बहुत जल्दी उन्हें अपना लेती है।

៚  और जब धरम के ठेकेदार उनमें सवाब बता देते हैं तो अ़वाम उन्हें और भी मज़ा ले कर करने लगते हैं कि यह ख़ूब रही, रंगरलियां भी हो गई और सवाब भी मिला, तफ़रीह और दिल लगी भी हो गई खेल तमाशे भी हो गये और जन्नत का काम, क़ब्र का आराम भी हो गया।..✍🏻
 
                *⊆ ↬ बा - हवाला ↫ ⊇*

*📬 मुहर्रम में क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफह - 07 📚*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  06

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     ❝ आओं  सच्चे  हुसैनी  बनें!❞
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 मुहम्मद की मोहब्बत दींने हक़ की शर्त अव्वल हैं!
 
 इसी में हो ग़र ख़ामी तो सब कुछ ना मुक़म्मल हैं!
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៚  मौलवी साहब या मियां हुजूर ने कह दिया है कि सब जाइज़ व सवाब का काम है ख़ूब करो और हमने भी ऐसे मौलवी साहब को ख़ूब नज़राना देकर खुश कर दिया है, और उन्होंने हम को तअ़ज़िये बनाने, घुमाने, ढोल बजाने और मेले ठेले लगाने और उन में जाने की इजाजत दे दी है।

៚  अल्लाह नाराज़ हो या उस का रसूल ऐसे मौलवियों और पीरों से हम ख़ूश और वह हम से खुश।

៚  इस सब के बावजूद अ़वाम में ऐसे लोग भी काफ़ी हैं जो ग़लती करते हैं और इसको ग़लती समझते भी हैं और इस हराम को हलाल बताने वाले मौलवियों की भी उनकी नजर में कुछ औकात नहीं रहती ।

៚  एक गांव का वाक़िआ है कोई तअ़ज़िये बनाने वाला कारीगर नहीं मिल रहा था या बहुत सी रक़म का मुतालबा कर रहा था वहां की मस्जिद के इमाम ने कहा कि किसी को बुलाने की ज़रूरत नहीं है तअ़जिया मैं बना दूंगा और इस इमाम ने गांव वालों को ख़ुश करने के लिए बहुत उ़मदा बढ़िया और खूबसूरत तअ़जिया बना कर दिया और फिर उन्ही तअ़ज़िये दारों ने इस इमाम को मस्जिद से निकाल दिया और यह कह कर इस का हिसाब कर दिया कि यह कैसा मौलवी है कि तअ़जिया बना रहा है मौलवी तो तअ़ज़िये दारी से मना करते हैं, और मौलवी साहब का बकौल शाइर यह हाल हुआ कि,

न ख़ुदा ही मिला न विसाले स़नम
न यहां के रहे न वहां के रहे !

៚  दरअसल बात यह है कि सच्चाई में बहुत त़ाक़त है और ह़क़ ह़क़ ही होता है, और सर चढ़ कर बोलता है और ह़क़ की अहमियत उनके नज़दीक भी होता है जो ना ह़क़ पर हैं।

៚  बहरे हाल इस में कोई शक नहीं कि एक बड़ी तादाद में हमारे सुन्नी मुसलमान अ़वाम भाई हज़रत इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु की मुहब्बत में ग़लत फ़हमियों के शिकार हो गए और मज़हब के नाम पर नाजाइज़ तफ़रीह और दिल लगी के काम करने लगे उनकी ग़लत फ़हमियों को दूर करने के लिए हम ने यह मज़मून मुरत्तब किया है।

៚  इस मुख़्तसर मज़मून में हम यह दिखायेंगे कि आज कल मुहर्रम के महीने में इस्लाम व सुन्नियत के नाम पर जो कुछ होता है इस में इस्लामी नुक़त़ा_ए_नज़र से सुन्नी उलेमा के फ़तवों के मुताबिक जाइज़ क्या है और नाजाइज़ क्या है किस में गुनाह है और किस में सवाब, इस में बहस व मुंहाहिसे और तफ़सील की तरफ न जा कर सिर्फ जाइज़ और नाजाइज़ कामों का एक जाइज़ा पेश करेंगे और पढ़ने और सुनने वालों से गुज़ारिश है कि वह ज़िद और हठ धरमी से काम न लें, मौत व क़ब्र और आख़िरत को पेशे नज़र रखें।

៚  मेरे अ़ज़ीज़ इस्लामी भाईयों ! हम सब को यक़ीनन मरना है, और ख़ुदा_ए_तआ़ला को मुंह दिखाना है वहां ज़िद और हठ धरमी से काम नहीं चलेगा, भाईयों! आंखें खोलो और मरने से पहले होश में आ जाओ और पढ़ो समझो और मानो।..✍🏻
 
                *⊆ ↬ बा - हवाला ↫ ⊇*

*📬 मुहर्रम में क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफह - 08 📚*

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 मुहम्मद की मोहब्बत दींने हक़ की शर्त अव्वल हैं!
 
 इसी में हो ग़र ख़ामी तो सब कुछ ना मुक़म्मल हैं!


                     मुह़र्रम में क्या जाइज़ !? 
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៚  हम पहले ही लिख चुके हैं कि हज़रत इमाम हुसैन हों या दूसरी अ़ज़ीम इस्लामी शख़्सियतें उनसे असली सच्ची हक़ीक़ी मुहब्बत व अ़क़ीदत तो यह है कि उनके रास्ते पर चला जाये और उन का रास्ता इस्लाम है!

पांचों वक़्त की नमाज की पाबन्दी की जाये,

रमज़ान के रोज़े रखे जायें,

माल की ज़कात निकाली जाये,

बस की बात हो तो ज़िन्दगी में एक मर्तबा ह़ज भी किया जाये,

जुए शराब ज़िना, सूद, झूट, गीबत, फिल्मी गानों, तमाशों और पिक्चरों वगैरह नाजाइज़ हराम कामों से बचा जाये,

៚  और उसके साथ साथ उन की मुहब्बत व अ़क़ीदत में मुन्दर्जा ज़ैल काम किए जायें तो कुछ हर्ज़ नहीं बल्कि बाइसे ख़ैर व बरकत है।..✍🏻
 
                *⊆ ↬ बा - हवाला ↫ ⊇*

*📬 मुहर्रम में क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफह - 09 📚*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  08

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 इसी में हो ग़र ख़ामी तो सब कुछ ना मुक़म्मल हैं!


                        न्याज़ व फ़ातिहा
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៚   हज़रत इमाम रद़िअल्लाहु तआ़ला अन्हु और जो लोग उनके साथ शहीद किए गये उनको सवाब पहुंचाने के लिए सदक़ा व ख़ैरात किया जाये!

៚   गरीबों मिस्किनों को या दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्ते दारों वग़ैरह को शरबत या खिचड़े या मलीदे वगै़रा कोई भी जाइज़ खाने पीने की चीज़ खिलाई या पिलाई जाये और उसके साथ आयाते कुरआनिया की तिलावत कर दी जाये तो और भी बेहतर है इस सब को उ़र्फ़ में नियाज़ फ़ातिहा कहते हैं यह सब बिला शक जाइज़ और सवाब का काम है, और बुजुर्गों से इज़हारे अ़क़ीदत व मुहब्बत और उन्हें याद रखने का अच्छा त़रीका है लेकिन इस बारे में चन्द बातों का ध्यान रखना जरूरी है!

៚  ① ➪ न्याज़ व फ़ातिहा किसी भी हलाल और जाइज़ खाने पीने की चीज़ पर हो सकती है उसके लिए शरबत खिचड़े और मलीदे को ज़रूरी ख्याल करना जिहालत है अलबत्ता इन चीजों पर फ़ातिहा दिलाने में भी कोई हर्ज़ नहीं है, अगर कोई इन मज़कूरा चीजों पर फ़ातिहा दिलाता है तो वह कुछ बुरा नहीं करता, हां जो उन्हें ज़रूरी ख्याल करता है उनके एलावा किसी और खाने पीने की चीज़ पर मुहर्रम में फ़ातिहा सही नहीं मानता वह ज़रूर जाहिल है।

៚  ② ➪ न्याज़ फ़ातिहा में शेख़ी खो़री नहीं होनी चाहिए और न खाने पीने की चीज़ों में एक दूसरे से मुकाबिला बल्कि जो कुछ भी हो और जितना भी हो सब सिर्फ अल्लाह वालों के ज़रिए अल्लाह तआ़ला की नज़दीकी और उसका कुर्ब और रज़ा हासिल करने के लिए हो और अल्लाह के नेक बन्दों से मुहब्बत इस लिए की जाती है कि उन से 
मुहब्बत करने और उनके नाम पर खाने खिलाने और उन की रुहों को अच्छे कामों का सवाब पहुंचाने से अल्लाह राज़ी हो, और अल्लाह को राज़ी करना ही हर मुसलमान की ज़िन्दगी का असली मक़सद है।

៚  ③ ➪ न्याज़ फ़ातिहा बुजुर्गों की हो या बड़े बुढ़ों की उस के तौर तरीके जो मुसलमानों में राइज हैं जाइज़ और अच्छे काम हैं फ़र्ज और वाजिब यानी शरअन लाजिम व ज़रूरी तो नहीं अगर कोई करता है तो अच्छा करता है और नहीं करता है तब भी गुनाहगार नहीं, हां कभी भी और बिल्कुल न करना महरूमी है, न्याज़ व फ़ातिहा को न करने वाला गुनाहगार नहीं है, हां इस से रोकने और मना करने वाला ज़रूर गुमराह व बदमज़हब है और बुजुर्गों के नाम से जलने वाला है।..✍🏻
 
                *⊆ ↬ बा - हवाला ↫ ⊇*

*📬 मुहर्रम में क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफह - 10 📚*

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                        न्याज़ व फ़ातिहा
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៚ ❹ ➪  न्याज व फ़ातिहा के लिए बाल बच्चों को तंग करने की या किसी को परेशान करने की या खुद परेशान होने की या उन कामों के लिए क़र्ज़ा लेने की या गरीबों मजदूरों से चन्दे करने की कोई ज़रूरत नहीं, जैसा और जितना मौका हो उतना करे और कुछ भी न हो तो खाली कुरआन या कलमा_ए_त़य्यबा या दुरूदशरीफ़ वग़ैरह का ज़िक्र करके या नफिल नमाज़ या रोज़े रख कर सवाब पहुंचा दिया जाये तो यह काफ़ी है, और मुकम्मल न्याज़ और पुरी फ़ातिहा है, जिस में कोई कभी यानी शरअ़न ख़ामी नहीं है, खुदा_ए_तआ़ला ने इस्लाम के ज़रिए बन्दों पर उनकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डाला ज़कात हो या स़दका_ए_फ़ित्र और कुरबानी सिर्फ उन्हीं पर फ़र्ज व वाजिब हैं जो साहिबे निसाब यानी शरअ़न मालदार हों, हज़ भी उसी पर फ़र्ज किया गया जिस के बस की बात हो, अ़क़ीक़ा व वलीमा उन्हीं के लिए सुन्नत हैं जिनका मौका हो जब कि यह काम फ़र्ज व वाजिब या सुन्नत हैं, और न्याज व फ़ातिहा उ़र्स वग़ैरह तो सिर्फ बिदआ़ते ह़सना यानी सिर्फ अच्छे और मुस्तहब काम हैं, फर्ज व वाजिब नहीं हैं यानी शरअ़न लाजिम व ज़रूरी तो नहीं हैं, फिर न्याज व फ़ातिहा के लिए क़र्ज़ लेने, परेशान होने और बाल बच्चों को तंग करने की क्या जरूरत है, बल्कि हलाल कमाई से अपने बच्चों की परवरिश करना बजाते खुद एक बड़ा कारे ख़ैर, सवाब का काम है।

៚  ख़ुलासा यह कि उ़र्स, न्याज व फ़ातिहा वग़ैरह बुजुर्गों की यादगारें मनाने की जो लोग मुख़ालिफ़त करते हैं वह गलती पर हैं और जो लोग सिर्फ उन कामों को ही इस्लाम समझे हुये हैं और शरअ़न उन्हें लाजिम व ज़रूरी ख्याल करते हैं वह भी बड़ी भूल में हैं।

៚ ❺ ➪ न्याज व फ़ातिहा की हो या कोई और खाने पीने की चीज़ उसको लुटाना, भीड़ में फेंकना कि उनकी बे अदबी हो पैरों के नीचे आये या नाली वग़ैरह गन्दी जगहों पर गिरे एक ग़लत तरीका है, जिस से बचना ज़रूरी है, जैसा कि मुहर्रम के दिनों में कुछ लोग पूड़ी, गुलगुले या बिस्किट वग़ैरह छतों से फ़ेंकते और लुटाते हैं यह ना मुनासिब हरकतें हैं।...✍🏻
 
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                        न्याज़ व फ़ातिहा
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៚ ❻  ➪  न्याज़ व फ़ातिहा यानी बुजुर्गों को उनके विसाल के बाद या आम मुरदों की रुहों को उनके मरने के बाद सवाब पहुंचाने का मतलब सिर्फ यहीं नहीं कि खाना पीना सामने रख कर और कुरआने करीम पढ़ कर ईसाले सवाब कर दिया जाये, बल्कि दूसरे दीनी इस्लामी या रिफ़ाहे आ़म यानी अ़वाम मुस्लिमीन को नफ़ा पहुँचाने वाले काम कर के उन का सवाब भी पहुँचाया जा सकता है।

किसी ग़रीब बीमार का एलाज करा देना,

किसी बाल बच्चेदार बेघर मुसलमान का 🏡 घर बनवा देना,

किसी बे क़सूर कैदी की मदद कर के जेल से रिहाई दिलाना,

जहाँ मस्जिद की ज़रूरत हो वहाँ मस्जिद बनवा देना,

अपनी तरफ़ से इमाम व मुअज़्ज़िन की तंख़्वाह जारी कर देना,

मस्जिद में नमाज़ियों की ज़रुरतों में ख़र्च करना,

इल्मे दीन हासिल करने वालों या इल्म फैलाने वालों की मदद करना,

दीनी 📖 किताबें छपवा कर या ख़रीद कर तक़सीम करना,

दीनी मदरसे चलाना,

रास्ते और सड़कें बनवाना या उन्हें सही करना,

रास्तों में राह गीरों की ज़रुरतों के काम कराना वग़ैरह वग़ैरह।

៚ यह सब👆 ऐसे काम हैं कि उन्हें करके या उन पर ख़र्चा करके, बुजुर्गों या बड़े बूढ़ों के लिए ईसाले सवाब की नियत कर ली जाये तो यह भी एक किस्म की बेहतरीन न्याज व फ़ातिहा हैं, ज़िन्दों और मुर्दों सभी का उसमें नफ़ा और फ़ाइदा है।

៚ हदीस पाक में है कि हुज़ूर पाक के एक सहाबी हज़रते सअद इब्ने उ़बादा रद़िअल्लाहु तआ़ला अन्हु की माँ का विसाल हुआ तो वह बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुए और अ़र्ज़ किया-

៚ या रसूलुल्लाहﷺ ! मेरी माँ का इन्तिकाल हो गया है तो कौनसा स़दक़ा बेहतर रहेगा। सरकार ने फ़रमाया- पानी बेहतर रहेगा। उन्होंने एक कुँआ खुदवा दिया और उस के क़रीब खड़े होकर कहा- यह कुँआ मेरी माँ के 
लिए हैं।...✍🏻
 
*📔 मिश्कात बाबो फ़ज़लुस्स़दक़ा सफा़-169*

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                        न्याज़ व फ़ातिहा
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៚  यानी जो लोग इस से पानी पियें उसका सवाब मेरी माँ को फहुँचता रहे।

៚  शारेहीने हदीस फ़रमाते हैं- हुज़ूर ﷺ ने पानी इसलिए फ़रमाया कि मदीना तय्यबा में पानी की किल्लत थी पीने का पानी ख़रीदना पड़ता था, गरीबों के लिए दिक्कत का सामना था इसलिए हुज़ूरﷺ ने हज़रत सअ़द से कुँआ खोदने के लिए फ़रमाया।

इस हदीस से यह बात साफ़ हो जाती है कि मुर्दों को कारेख़ैर का सवाब पहुँचता है और यह कि जिस चीज़ का सवाब पहुँचाना हो उस खाने पीने की चीज़ को सामने रख कर यह कहने में कोई हर्ज़ नहीं कि उसका सवाब फ़ला को पहुँचे क्योंकि हज़रत सअ़द ने कुँआ खुदवा कर कुँआ की तरफ़ इशारा कर के यह अलफ़ाज़ कहे थे, लेकिन इस को ज़रूरी भी नहीं समझना चाहिए कि खाना पानी सामने रख कर ही ईसाले सवाब जाइज़ है, दूर से भी कह सकते हैं, दिल में कोई नेक काम कर के या कुछ पढ़ कर या खिला कर किसी को सवाब पहुंचाने की नियत करले तब भी काफ़ी है, अल्लाह तआ़ला सवाब देने वाला है वह दिलों के अह़वाल से खूब वाक़िफ़ है, यह सब तरीके दुरुस्त हैं उन में से जो किसी तरीके को ग़लत कहे वही खुद ग़लत है।...✍🏻


                *⊆ ↬ बा - हवाला ↫ ⊇*

*📬 मुहर्रम में क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफह - 14 📚*

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     ❝ आओं  सच्चे  हुसैनी  बनें!❞
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 मुहम्मद की मोहब्बत दींने हक़ की शर्त अव्वल हैं!
 
 इसी में हो ग़र ख़ामी तो सब कुछ ना मुक़म्मल हैं!


                          ज़िक्रे शहादत
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៚  हज़रत सय्यद इमाम हुसैन रद़िअल्लाहु तआ़ला अन्हु और दूसरे हज़राज अहले बैअत किराम का ज़िक्र नज़्म में या नस्र में करना और सुनना यकीनन जाइज़ है, और बाइसे खैर व बरकत व नुजूले रहमत है लेकिन इस सिलसिले में नीचे लिखी हुई चन्द बातों को ध्यान में रखना ज़रूरी है!

៚   जि़क्रे शहादत में सही रिवायात और सच्चे वाक़िआत ब्यान किए जायें, आज कल कुछ पेशावर मुक़र्रिरों और शाइरों ने अ़वाम को खुश करने और तक़रीरों को जमाने के लिए अ़जीब-अजीब किस्से और अनोखी निराली हिकायात और गढ़ी हुई कहानियाँ और करामात बयान करना शुरू कर दिया है, क्योंकि अ़वाम को ऐसी बातें सुनने में मज़ा आता है, और आज-कल के अकसर मुक़र्रिरों को अल्लाह व रसूल से ज्यादा अ़वाम को खुश करने की फ़िक्र रहती है, और बज़ाहिर सच से झूठ में मज़ा ज़्यादा है और जलसे ज़्यादा तर अब मज़ेदारियों के लिए ही होते है।

៚  आला हज़रत मौलाना शाह अहमद रज़ा रहमतुल्लाहि तआ़ला अलैहि फंरमाते हैं शहादत नामे नज़म या नस्र जो आज-कल अ़वाम में राइज हैं अकसर रिवायाते बातिला व बे सरोपा से ममलू और अकाज़ीब मोजूआ पर मुश्तमिल हैं। ऐसे बयान का पढ़ना और सुनना, वह शहादत नामा हो, ख़्वाह कुछ और, मज्लिसे मीलादे मुबारक में हो ख़्वाह कही और मुतलक़न हराम व नाजाइज़ हैं।

*📕 फ़तावा रज़विया जिल्द-24, सफा-514, मतबुआ रज़ा फ़ाउन्डेशन लाहौर*

៚  और उसी किताब के सफ़ा-522 पर इतना और है यूँही मरसिये, ऐसी चीज़ों का पढ़ना सुनना सब गुनाह व 
हराम है।...✍

                *⊆ ↬ बा - हवाला ↫ ⊇*

*📬 मुहर्रम में क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफह - 15 📚*

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मुहम्मद की मोहब्बत दींने हक़ की शर्त अव्वल हैं!
 
 इसी में हो ग़र ख़ामी तो सब कुछ ना मुक़म्मल हैं!


                          ज़िक्रे शहादत
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៚  हदीस पाक में है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम ने मरसियों से मना फ़रमाना।

 ៚  ज़िक्रे शहादत का मक़सद सिर्फ वाक़िआत को सुन कर इबरत व नसीहत हासिल करना हो और साथ ही साथ स्वालिहीन के ज़िक्र की बरकत हासिल करना ही हो, रोने और रुलाने के लिए वाक़िआते करबला बयान करना नाजाइज़ व गुनाह है, इस्लाम में 3 दिन से ज़्यादा मौत का सोग जाईज़ नहीं।

៚ आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खाँ बरेलवी फ़रमाते हैं शरीअ़त में औरत को शौहर की मौत पर चार महीने दस दिन सोग मनाने का हुक्म दिया है, औरों की मौत के तीसरे दिन तक इजाज़त दी है, बाकी हराम है, और हर साल सोग की तजदीद तो अस़लन किसी के लिए हलाल नहीं।

*📗 फ़तावा रज़विया जिल्द-24, सफहा-495*

៚ और रोना रुलाना सब राफज़ियों के तौर तरीके हैं क्योंकि उनकी किस्मत में ही यह लिखा हुआ है, राफ़्ज़ी ग़म मनाते हैं और ख़ारज़ी खुशी मनाते हैं और सुन्नी वाक़िआते करबला से नसीहत व इबरत हासिल करते हैं और दीन की ख़ातिर कुरबानियाँ देने और मुसीबतों पर सब्र करने का सबक लेते हैं और उनके ज़िक्र से बरकत और फ़ैज़ पाते हैं।

៚  हां अगर उनकी मुसीबतों को याद कर के ग़म हो जाये या आंसू निकल आयें तो यह मुहब्बत की पहचान है। मतलब यह है कि एक होता है ग़म मनाना और ग़म करना, और एक होता है ग़म हो जाना, ग़म मनाना और करना नाजाइज़ है और ध्यान आने पर खुद ब खुद हो जाये तो जाइज़ है।...✍

                *⊆ ↬ बा - हवाला ↫ ⊇*

*📬 मुहर्रम में क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफह - 17 📚*

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दोस्त किसे बनायें

 


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     ❝ 🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !?❞

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              *❝ कलिमात -ए- हसन !? ❞* 

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↳ अज़ हज़रत अल्लामा मौलाना ज़ावेद रज़ा मरकज़ी साहब क़िब्ला ↲

•••➲  आज इस पुर फितन दौर में मुसलमान फ़िक्र ए आख़िरत की कमी के बाइस दुनयावी मफ़ाद की ख़ातिर किसी से भी दोस्ती कर लेते हैं और बहुत बार अपने हम नशीनों की वजह से अख़लाक़ ए रज़ीला इख़्तियार कर लेते हैं और कुछ जगह देखने में आया के अपने अक़ाइद ही बिगाड़ लेते हैं अल अमान वल हफ़ीज़ ऐसे दोस्तों से!

•••➲  जनाब हस्सान सल्लमाहु का मज़मून निहायत ही उम्दा है दोस्ती किस से की जाये? इस में काफ़ी मुआविन साबित होगा अल्लाह क़ुबूल फरमाए।...✍🏻

*आमीन*

  *📬  दोस्त  किसे  बनायें  सफ़ह - 02  📚*

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     ❝ 🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !?❞

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                  *❝  तक़रीज़!? ❞* 

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↳ अज़ उस्ताज़ ए मुहतरम हाफिज़ मुहम्मद तौहीद अहमद खान रज़वी साहब क़िब्ला, मुदर्रिस जामिया तहसीनिया जिया उल उलूम बरेली शरीफ़ ↲ 

    *“नेकों की सोहबत तुझे नेक बनाती है"*

•••➲  सोहबत इंसान पर असर अंदाज़ होती है अच्छी सोहबत के ज़रिये इंसान अच्छा बनता है और बुरी सोहबत के नताइज इंसान को बुराई की तरफ़ माइल करने की सूरत में ज़ाहिर होते हैं हदीस ए पाक का मफ़हूम है के इंसान अपने दोस्त के दीन पर होता है इस हदीस से भी हमें ये दर्स मिलता है के इंसान को दोस्त बनाते वक़्त बहुत एहतियात और समझदारी से काम लेना चाहिए और दोस्त बनाते वक़्त दीनदारी पर तवज्जोह देना चाहिए दीनदार को ही दोस्त बनायें जिसकी दोस्ती उस शख़्स को भी दीनदारी की तरफ़ माइल करे।

•••➲  मौलवी हस्सान रज़ा का ये मज़मून "दोस्त किसे बनायें? " माशा अल्लाह बहुत ख़ूब है इस मज़मून में मौलाना मौसूफ़ ने अहादीस और बुजुर्गाने दीन के अक़वाल की रौशनी में ये वाज़ेह किया है के दोस्त किसे बनाया जाये? अल्लाह तआला की बारगाह में दुआ है के मौलाना मौसूफ़ के इल्म ओ अमल में बरकतें अता फरमाए।...✍🏻 *आमीन*

*तौहीद अहमद खान रज़वी*

  *📬  दोस्त  किसे  बनायें  सफ़ह - 03  📚*

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     ❝🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !? ❞

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              *❝  पेश ए इलाज़!? ❞* 

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•••➲  इंसान की ज़िन्दगी में दोस्त की बहुत अहमियत होती है सच्चा दोस्त वही होता है जो इंसान को अच्छाइयों की तरफ़ माइल करता है और बुराइयों से बचाने की कोशिश करता है वो कभी नहीं चाहता कि उसका दोस्त गुमराह हो जाए और अंधेरी राहों में भटकता फिरे वह कभी नहीं चाहता कि उसका दोस्त इस्लामी अक़ाइद से मुंह फेरे अगर कुछ लम्हे ऐसे आते भी हैं जिसमें उसका दोस्त दूसरों की सोहबत में बैठकर ग़लत रास्ता इख़्तियार कर लेता है तो वह अपने दोस्त की इसलाह करने की कोशिश करता है वहीं दूसरी तरफ़ एक बुरा दोस्त जो इंसान को गुमराहियों के दलदल में फंसा कर उसके ईमान को बर्बाद कर देता है बुरी दोस्ती के असरात यहां तक पहुंच जाते हैं के इंसान बुरी बुरी आदतों में पढ़कर दुनियावी ज़िंदगी तो बर्बाद करता ही है साथ साथ आख़िरत भी बर्बाद कर लेता है।...✍🏻

  *📬  दोस्त  किसे  बनायें  सफ़ह - 04  📚*

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     ❝ 🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !?❞

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              *❝ पेश ए इलाज़!? ❞* 

  ❏  ••────•◦❈◦•────••   ❏ 


•••➲  मौजूदा ज़माने में जो गुमराही फ़ैल रही है वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस, मौदूदियत और तमाम बतिल फिरकों के जरासीम समाज में फैल रहे हैं उसके फैलने की असल वजह यह भी है कि एक सुन्नी शख़्स बगैर सोचे समझे दुनियावी फ़ायदे की ख़ातिर जब किसी गुमराह शख़्स से दोस्ती कर लेता है तो वह गुमराह शख़्स रफ्ता रफ्ता अपने नज़रियों को सन्नी शख़्स के दिल में डाल देता है आख़िरकार वह सुन्नी भी अपने अक़ाइद सही ना जाने की बुनियाद पर उसकी बातों को सही समझ कर उस पर ईमान ले आता है और बर्बाद हो जाता है इस तरह के वाक्यात कॉलेज और यूनिवर्सिटी में ज़्यादा देखने में आते हैं क्योंकि वहां दोस्ती के नाम पर ऐसी वारदात होती रहती है इसलिए हर इंसान के लिए ज़रूरी है कि दोस्त बनाने से पहले उसे कुरआन और हदीस और शरियत ए इस्लामी की रौशनी में परखे फिर उससे दोस्ती के लिए हाथ आगे बढ़ाए तो यह उसके लिए बेहतर होगा।

•••➲  इस मकाले में हम अल्लाह तआला की तौफीक़ से दोस्ती की हकीक़त और उसके उसूल को बयान करेंगे जो कुरआन और हदीस और बुजुर्गान ए दीन की तालीमात से मांखूज किए गए हैं अल्लाह तआला इस मकाले को क़बूलियत अता फरमाए।...✍🏻 *आमीन*

*✍मुहम्मद हस्सान रज़ा राईनी*

  *📬  दोस्त  किसे  बनायें  सफ़ह - 04  📚*

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     ❝🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !? ❞

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*❝ गहरे दोस्त उस दिन एक दूसरे के दुश्मन होंगे लेकिन परहेज़गार, सूरह जुखरूफ़ 67 ❞* 

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•••➲  अकसर मुफ़स्सेरीन ए इकराम ने इस आयत ए करीमा की तफ़सीर में हज़रत अली रदिअल्लाहु अन्हु का ये कौल पेश किया है।

•••➲  हज़रत अली रदिअल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया दो दोस्त मोमिन और दो दोस्त काफिर होते हैं एक मोमिन मर जाता है वो अर्ज़ करता है ऐ रब मेरे फलां शख़्स मुझे तेरी और तेरे रसूल की इताअत करने का मशवरह देता था नेक काम करने का हुक्म देता था और बुरे काम से रोकता था वो मुझ से कहता था के एक दिन मुझे तेरे सामने आना पढ़ेगा ऐ मेरे रब मेरे बाद उसे गुमराह न कर देना और जैसे तू ने मुझे राह ए रास्त पर चलने की तौफ़ीक़ दी ऐसे ही उस को भी हिदायत पर क़ायम रखना और जिस तरह तूने मेरी इज्ज़त अफ़ज़ाई की उसी तरह उस की भी इज्ज़त अफ़ज़ाई करना जब उसका दोस्त मर जाता है तो अल्लाह दोनों को यकजा करके फरमाता है तुम दोनों एक दुसरे की तारीफ़ करों चुनाचे हर एक दुसरे के मुताल्लिक़ कहता है ये अच्छा भाई है, अच्छा दोस्त है, अच्छा साथी है।...✍🏻

  *📬  दोस्त  किसे  बनायें  सफ़ह - 05  📚*

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     ❝ 🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !?❞

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*❝ गहरे दोस्त उस दिन एक दूसरे के दुश्मन होंगे लेकिन परहेज़गार, सूरह जुखरूफ़ 67 ❞* 

  ❏  ••────•◦❈◦•────••   ❏ 


•••➲  और जब दोनों काफिर दोस्तों में से एक मर जाता है तो वो अर्ज़ करता है मेरे रब फलां शख़्स मुझे तेरी और तेरे रसूल की इताअत से मना करता था बुरे काम करने का मशवरह देता था और अच्छे काम से रोकता था और मुझ से कहता था मुझे तेरे पास आना नहीं है वो बुरा दोस्त, बुरा भाई, बुरा साथी है।

📙 तफ़सीर ए मज़हरी, तफ़सीर ए कुर्तुबी, तफ़सीर दुर्रे मंसूर, तफ़सीर इब्ने कसीर

•••➲  *✍इमाम कुर्तुबी नई इस आयत के बारे में फ़रमाया।?* यह आयत हर मोमिन, मुत्तकी, काफिर और गुमराह के बारे में आम है।

📗 तफ़सीर ए कुर्तुबी

•••➲  इस तफसील से यह साबित हो गया कि अगर तुमने किसी गुमराह शख़्स से दोस्ती रखी और उसकी सोहबत इख़्तियार की तो तुम्हारा वही बुरा अंज़ाम होगा जो उस का होने वाला है फिर यह दोस्ती भी तुम्हें जहन्नम का ईंधन बनने से नहीं रोक पाएगी इसलिए दोस्ती करने से पहले देखें कि सामने वाला शख़्स किस अकीदे पर है अगर वह अहले सुन्नत व जमाअत के अक़ीदे पर मज़बूती से क़ायम है तो उस से दोस्ती करना अच्छा है और अगर ऐसा नहीं है तो यह दोस्ती तुम्हारे ईमान के लिए खतरनाक साबित होगी।...✍🏻

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     ❝🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !? ❞

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*❝ दोस्ती की हक़ीक़त कुरआन ए मजीद की रौशनी में!? ❞* 

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•••➲  हमारी दोस्ती का पहला मक़सद इस्लाम यानी अहले सुन्नत व जमाअत का फरोग करना और हर लम्हा दीन ए इस्लाम के तहफ़्फ़ुज़ के लिए गामजन रहना होना चाहिए और दूसरा मक़सद अपनी ज़िंदगी को शरियत ए इस्लामी के सांचे में ढालकर अपने दोस्तों को भी अच्छे और नेक आमाल की तरगीब देना चाहिए क्योंकि कयामत के दिन भी वही दोस्ती काम देगी जो दो मुत्तकीयों के दरमियान हो अगर हम बद किरदार गुमराह लोगों के साथ मिलकर कोई भी अच्छा काम करेंगे हालांकि हमारी नियत दुरुस्त हो तो ऐसे लोगों के साथ मिलकर अच्छा काम करने से बजाए नफ़ा के नुकसान के इमकानात ज़्यादा होंगे ऐसी दोस्ती कयामत के दिन बजाय सवाब के जान का बवाल बन जाएगी इसी को अल्लाह तआला ने कुरआन ए मजीद में इरशाद फरमाया।...✍🏻

  *📬  दोस्त  किसे  बनायें  सफ़ह - 05  📚*

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     ❝ 🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !?❞

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*❝ दोस्ती के ताल्लुक़ से एक हदीस ए पाक!? ❞* 

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•••➲  हुज़ूर अकरमﷺ ने इरशाद फरमाया आदमी अपने दोस्त के दीन (यानी तरीक़े) पर होता है इसलिए हर शख़्स को चाहिए वह इस बात का जायज़ा ले कि उसका दोस्त कौन है।?

📗तिर्मिज़ी , अबू दाऊद

*✍इस हदीस की तशरीह करते हुए अल्लामा मोहम्मद यासीन कसूरी नक्शबंदी लिखते हैं।*

•••➲  एक दोस्त दूसरे दोस्त के अक़ाईद, अफ़कार से ज़रूर मुतास्सिर होता है दोस्त अच्छा हो तो ये भी आला अख़लाक़ का मालिक होगा और अगर दोस्त बद अख़लाक़ होगा तो ये भी बद अख़लाक़ और बद ज़ुबान होगा। अरबी का मशहूर मकूला है (जिसका मफ़हूम है) किसी शख़्स से बराहे रास्त ना पूछो बल्कि उसके अहवाल उसके साथियों से दरयाफ्त करो यानी उसका साथी हुस्ने अख़लाक़ का पैकर, दीनदार, नमाज़ी, साहिबे तक़वा और सादिक़ अमीन होगा तो यह भी उन सफात का जामे होगा वरना नहीं हदीस में भी यही हकीक़त बयान की गई।...✍🏻

📙 अनवार ए नबवी शरह जामे तिर्मिज़ी

  *📬  दोस्त  किसे  बनायें  सफ़ह - 06  📚*

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     ❝ 🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !?❞

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*❝ दोस्ती के ताल्लुक़ से एक हदीस ए पाक!? ❞* 

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*✍अहमद यार खान नईमी रहमतुल्लाह अलेह इस हदीस ए पाक की तशरीह करते हुए फरमाते हैं।*

•••➲   दीन से मुराद या तो मिल्लतो मज़हब है या सीरत व अख़लाक़, दूसरे मायने ज़्यादा ज़ाहिर हैं यानी अमूमन इंसान अपने दोस्त की सीरत, अख़लाक़ इख्तियार कर लेता है कभी उसका मज़हब भी इख़्तियार कर लेता है लिहाजा अच्छों से दोस्ती रखो ताकि तुम भी अच्छे बन जाओ सूफिया फरमाते हैं। न साथ रहो मगर अल्लाह रसूल की फरमा बरदारी करने वालों के, ना दोस्ती करो मगर मुत्तक़ी से (यानी अल्लाह, रसूल के फरमाबरदारों की सोहबत इख़्तियार करो और मुत्तक़ी लोगों से दोस्ती करो) यानी किसी से दोस्ताना करने से पहले उसे जांच लो के अल्लाह रसूल का मानने वाला है या नहीं, सूफिया फरमाते हैं कि इंसानी तबीयत में अख़्ज़ यानी ले लेने की खासियत से हरीस (लालची) की सोहबत से हिर्स (लालच) ज़ाहिद की सोहबत से ज़ोहद, तक़वा मिलेगा ख़्याल रहे कि ख़ुल्लत दिली दोस्ती को कहते हैं जिससे मुहब्बत दिल में दाख़िल हो जाए यह ज़िक्र दोस्ती और मुहब्बत का है किसी फासिक, फाजिर को अपने पास बिठाकर मुत्तक़ी बना देना तबलीग है हुज़ूर अकरम ﷺ ने गुनाहगारों को अपने पास बुला कर मुत्तक़ियों का सरदार बना दिया।...✍🏻

📗मिरात उल मनाजीह

  *📬  दोस्त  किसे  बनायें  सफ़ह - 06  📚*

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     ❝🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !? ❞

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*❝ दोस्ती के ताल्लुक़ से एक हदीस ए पाक!? ❞* 

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*✍इस हदीस ए पाक का ज़िक्र फरमाते हुए हज़रत दाता गंज बख़्श रहमतुल्लाह अलेह लिखते हैं।*

•••➲   अगर उस की सोहबत नेको के साथ है अगरचे वह खुद नेक ना हो तो वह सोहबत नेक है, इसलिए की नेको की सोहबत उसे नेक बना देगी और अगर उसकी सोहबत बुरों के साथ है अगरचे वह नेक है तो यह बुरा है क्योंकि वह उसकी बुराइयों पर राज़ी है और जो बुराइयों पर राज़ी हो अगरचे वो नेक हो बहर हाल बुरा है।

📗 कशफ़्ल महजूब

•••➲  हदीस पाक में सराहत कर दी गई कि हर शख़्स को यह चाहिए कि वह इस बात का जायजा ले कि उसका दोस्त कौन है क्या वो अहले सुन्नत व जमाअत के अक़ीदे पर है? क्या उसका किरदार अच्छा है? क्या वह अल्लाह के हुक्मों की पाबंदी करता है? क्या वह गुनाहों से बाज़ रहता है? यह तमाम उमूर उसके अंदर देखना लाज़िमी होंगे तब जाकर उससे दोस्ती की जाएगी लेकिन मौज़ूदा दौर में अक़्सर लोग दोस्ती में इन सब चीज़ों का एतबार नहीं करते बल के अपने दुनयावी फायदे देखते हैं अगर इस दोस्ती से आरज़ी तौर पर फ़ायदा हो भी जाए लेकिन यह आख़िरत में कुछ काम ना आएगी और वहां हमारी जान का वबाल बन जाएगी इसलिए ज़रूरी है कि दोस्ती सुन्नी सहीहुल अक़ीदा इंसान ही से करें।...✍🏻

  *📬  दोस्त  किसे  बनायें  सफ़ह - 06  📚*

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     ❝🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !? ❞

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           *❝ बुजुर्गाने दीन के अक़वाल!? ❞* 

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•••➲  हज़रत मालिक बिन दीनार रदिअल्लाहु अन्हु ने अपने दामाद हज़रत मुगीरा बिन शोबा रदिअल्लाहु अन्हु से फरमाया ऐ मुगीरा जिस भाई या साथी की रिफ़ाक़त तुम्हें दीनी फायदा ना पहुंचाए तुम इस जहान में उसकी सोहबत से बचो ताकि तुम महफूज़ रहो।

*📗कशफुल महजूब*

•••➲  हज़रत यहया बिन मुआज रदिअल्लाहु अन्हु फरमाते हैं वह दोस्त बहुत बुरा है जिसको दुआ करने की नसीहत करनी पड़े (क्योंकि एक लम्हे की सोहबत का हक यह है कि उसे हमेशा दुआए ख़ैर में याद रखा जाए) और वह दोस्त बहुत बुरा है जिसकी सोहबत ख़ातिर तवाज़ो की मोहताज हो (क्योंकि सोहबत का सरमाया ही यह है कि हमेशा बाहमी ख़ुशी व मसर्रत में गुज़रे) और वह दोस्त बहुत बुरा है जिससे गुनाह की माफी मांगने की ज़रूरत पेश आए (इसलिए के उज़्र ख़्वाही बेगानगी की अलामत है और सोहबत में ग़ैरियत और बेगानगी जुल्म है।...✍🏻

📙 मसनवी मौलाना रूम, दफ्तर अव्वल सफह 101

  *📬  दोस्त  किसे  बनायें  सफ़ह - 07  📚*

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     ❝🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !? ❞

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        *❝ बुजुर्गाने दीन के अक़वाल!? ❞* 

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•••➲  शाह अब्दुल अज़ीज रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी तफ़सीर फत्हुल अज़ीज़ में अल्लाह तआला के इस फरमान वो तो इस आरज़ू में हैं के किसी तरह तुम नरमी करो तो वो भी नरम पड़ जायें के ताल्लुक़ से सहल बिन अब्दुल्लाह तस्तरी रहमतुल्लाह अलैह का कौल नकल किया है फरमाते हैं हकाइक अत तंजील में है।

•••➲   के मर्द सहीहुल ईमान और मोमिन खालिस के लिए लाज़िम है कि गुमराहों, विदअतियों से मुहब्बत न करे और ना उनके साथ मजलिस करे और ना मेलजोल रखे और ना उनके हमराह खाए पिए और उसकी ज़ात में से गुमराहों के साथ नफ़रत और अदावत का इज़हार हो और जो शख़्स बद अक़ीदा लोगों से दोस्ती और प्यार करता है उस से ईमान का नूर खत्म हो जाता है।

📙 तफ़सीर अज़ीज़ी, पारह 29

•••➲   अल्लामा जलालुद्दीन रूमी रहमतुल्लाह अलैह सोहबत के ताल्लुक से मसनवी शरीफ़ में फरमाते हैं थोड़ी सी देर औलिया की हमनशीनी 100 साला बेरिया इबादत से बेहतर है अगर तू संग ए खारा व संगमरमर हो जब साहिब ए दिल के पास पहुंचेगा तो तू मोती बन जाएगा नेक की सोहबत तुझे नेक बना देगी बुरे की सोहबत तुझे बदबख्त बना देगी।...✍🏻

📕 मसनवी मौलाना रूम दफ्तर अव्वल सफह 102

  *📬  दोस्त  किसे  बनायें  सफ़ह - 07  📚*

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         📮  नेस्ट  पोस्ट  कंटिन्यू ان شاء الله

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     ❝ 🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !?❞

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              *❝ दोस्त किसे बनाये!? ❞* 

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•••➲  आप हज़रात बखूबी जान गए होंगे के एक अच्छे दोस्त और बुरे दोस्त में क्या फर्क होता है? और हमको किसे अपना दोस्त बनाना चाहिए? हमने कुरआन, हदीस और बुजुर्गाने दीन के अक़वाल की रौशनी में फर्क ज़ाहिर कर दिया ख़ुलासा ए कलाम ये, अच्छा दोस्त वही है जो ख़ुद भी सीधे रास्ते पर चले और दूसरों को भी सिरात अल मुस्तकीम पर चलाने के लिए कोशिश करे जो ख़ुद भी हराम कामों से बचता हो और दूसरों को भी हराम कामों से बचाने की कोशिश करता हो जो ख़ुद भी अल्लाह और रसूल अकरम ﷺ, अल्लाह के महबूब बंदो से मोहब्बत करता हों और दूसरों को भी उन ज़वात ए मुक़द्दसा से मुहब्बत करने का दर्स देता हो जो ख़ुद भी अल्लाह और हुज़ूर अकरम ﷺ के दुश्मनों से नफरत करता हो और दूसरों को भी नफ़रत करने की तलकीन करता हो और बुरा दोस्त वह है जिसका ख़ुलासा इन अशआर में है जिसका मफ़हूम है।...✍🏻 *पोस्ट आगे*


  *📬  दोस्त  किसे  बनायें  सफ़ह - 07  📚*

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         📮  नेस्ट  पोस्ट  कंटिन्यू ان شاء الله

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     ❝🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !? ❞

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              *❝  बुरा दोस्त कौन है!?  ❞* 

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•••➲  बुरे दोस्त की सोहबत से दूर भागो क्योंकि बुरा दोस्त बुरे सांप से भी ख़तरनाक और जानलेवा है क्यों के सांप के डसे हुए को सिर्फ़ जान का ख़तरा है और बुरे दोस्त की सोहबत से जान के साथ ईमान का भी ख़तरा है।

•••➲   बुरी सोहबत की मिसाल ऐसी है जैसे पाक साफ दूध में दो कतरे पेशाब के गिर जाएं तो दूध पलीद हो जाता है और वह दूध पीने के क़ाबिल नहीं रहता है इसी तरह बुरे दोस्त की सोहबत से नेक इंसान भी बुरा हो जाता है और उस सोहबत की इंतहा यह होती है कि उससे ईमान का नूर खींच लिया जाता है और बर्बाद हो जाता है इसलिए ज़रूरी है कि अपनी ज़िन्दगी को अच्छे दोस्तों के साथ मुज़य्यन करें जो तुम्हें दुनिया में क़ामयाब करें और आख़िरत में भी अपने साथ जन्नत में ले जाएं।...✍🏻

  *📬  दोस्त  किसे  बनायें  सफ़ह - 08  📚*

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     ❝ 🌹🤝🏻 दोस्त किसे बनायें !?❞

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              *❝ बुरा दोस्त कौन है!? ❞* 

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•••➲  आखिर में आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैह की वसीयत को पेश करना चाहूंगा जो आपने उम्मते मुस्लिमा की रहनुमाई के लिए फ़रमाई थी तुम मुस्तफा ﷺ की भोली भेड़ें हो, भेड़िए तुम्हारे चारों तरफ़ हैं यह चाहते हैं कि तुम्हें बहका दें तुम्हें फ़ितने में डाल दें तुम्हें अपने साथ जहन्नम में ले जाएं उन से बचो और दूर भागो, देओबंदी हुए राफ्ज़ी हुए, नेचरी हुए ,कादयानी हुए, चकड़ालवी हुए गरज़ कितने ही फ़िरते हुए और अब सब से नए गांधवी हुए जिन्होने उन सब को अपने अंदर ले लिया ये सब भेड़िये हैं इन के हमलों से अपना ईमान बचाओ हुज़ूर ﷺ अल्लाह के नूर हैं, हुज़ूर ﷺ से सहाबा रौशन हुए और उनसे ताबाईन रोशन हए, ताबेईन से तबे ताबेईन रोशन हुए उनसे अयम्मा ए मुज्तहेदीन रौशन हुए उनसे हम रौशन हुए अब हम तुमसे कहते हैं यह नूर हमसे लो तुम्हें इसकी ज़रूरत जो कि तुम हम से रोशन हो, वह नूर यह है कि अल्लाह और रसूल ﷺ की सच्ची मोहब्बत उनकी ताजीम और उनके दोस्तों की ख़िदमत और उनकी तकरीम और उनके दुश्मनों से सच्ची अदावत।

•••➲  जिससे अल्लाह रसूल ﷺ की शान में अदना तौहीन पाओ फिर वह तुम्हारा कैसा ही प्यारा क्यों ना हो फौरन उससे जुदा हो जाओ जिसको बारगाह ए रिसालत ﷺ में जरा भी गुस्ताख देखो फिर वह तुम्हारा कैसा ही बुजुर्ग मुअज्ज़म क्यों ना हो अपने अंदर से उसे दूध से मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दो।

📙  वसाया  शरीफ़

•••➲   इस वसीयत पर आप हज़रात अमल करें और मज़हब ए अहले सुन्नत वा जमाअत पर कायम रहें अल्लाह से दुआ है कि हमें बद अकीदा लोगों की सोहबत से बचाए और ईमान पर क़ायम रखे।...✍🏻 आमीन सुम्मा आमीन

  *📬  दोस्त  किसे  बनायें  सफ़ह - 08  📚*

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*📮पोस्ट मुकम्मल हुई अल्हम्दुलिल्लाह 🔃* 

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Tuesday, 15 September 2020

लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा

 




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 ❝ 📢 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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 ••• ➲  कुरआने करीम सूरए लुक़मान आयत नम्बर 19 में है। और अपनी आवाज़ कुछ पस्त (धीमी) कर!

••• ➲  इस आयत करीमा की तफ़सीर में सदरूल अफाज़िल मौलाना नई मुद्दीन साहब मुरादाबादी फ़रमाते हैं यानी शोर व शग़ब चीखने चिल्लाने से ऐहतिराज़ करो। हदीस पाक में है, हज़रत अबूमूसा अशअरी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं।

••• ➲  हम हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ एक सफ़र में थे मुसलमान ज़्यादा बुलन्द आवाज़ के साथ अल्लाहु अकबर! अल्लाह अकबर! कह रहे थे। हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया अपने नफ़्स के साथ नरमी करो, तुम किसी बहरे या गायब को नहीं पुकार रहे हो, तुम सुनने वाले और क़रीब को पुकार रहे हो जो तुम्हारे साथ है।...✍🏻

*📕 सही मुस्लिम किताबुज़्ज़िक्र,बावे इस्तिहबाब ख़िफ़्जुस्सौत विज़्ज़िक्र,व सही बुख़ारी, किताबुज्जिहाद वस्सैर,किताबुल मगाज़ी, किताबुद्द वात, किताबुलक़द्र, किताबुत्तौहीद*

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 03*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  02

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❝ 📢 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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 शारेह बुखारी इमाम बदरुद्दीन ऐनी फरमाते है !?
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      *📢 आवाज़ ज़्यादा बुलन्द न करो।*

••• ➲   हज़रत मिक़दाद रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी हदीस में है रसूलुल्लाहﷺ रात के वक़्त घर में दाखिल होते तो आहिस्ता से सलाम करते कि सोने वाले की नीन्द ख़राब न हो और जागने वाले सुन लें।"

••• ➲   यानी हुज़ूरﷺ को सोने वालों की नीन्द का इतना ख़्याल रहता था कि सलाम आहिस्ता आवाज़ से करते।

*📗 सही मुस्लिम किताबुलअशरिबा बाब इक्रागुज़्ज़ैफ ज़िल्द 2 सफह 184*

••• ➲  बुख़ारी किताबुद्दअवात बाबुल मौएज़ा साअतन बाद साअतिन में हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी हदीस है।

أن رسول الله صل الله عليه وسلم كان يتخولنا بالموعوفي الايام كراهية الشائة عليا

••• ➲   हुजूर सल्लल्लाहुﷺ रोज़ाना हमें वअज़ नहीं सुनाते थे, हुज़ूरﷺ को हमारा उकता जाना पसन्द नहीं था।

••• ➲   *एक और हदीस में है* एक मरतबा रात में नमाज़े तहज्जुद में हुज़ूरﷺ ने हज़रत सय्यदिना उमर फ़ारूक़े आज़म रदियल्लाहु तआला अन्ह को ऊँची आवाज़ से किरअत करते हुये मुलाहिज़ा फरमाया तो फ़रमाया :"नमाज़ में ऊँची आवाज़ से क्यों पढ़ते हो?..✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा - 03*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  03

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 ❝  📢 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा❞
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मशहूर मुहद्दिश उमर बिन शुअबा रिवायत करते है !?
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••• ➲   एक वाइज़ साहब हज़रत आइशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा के मकान के सामने बुलन्द आवाज़ से वज़ व तक़रीर फ़रमाते थे" हज़रत आइशा सिद्दीक़ा की यकसोई में फ़र्क था, यह हज़रत उमर फारूक़ रदियल्लाहु तआला अन्ह की खिलाफ़त का ज़माना था, उन्होंने अमीरुलमोमिनीन से शिकायत की "कि फलाँ साहिब मेरे मकान के सामने बहुँत बुलन्द आवाज़ से वअज़ कहते हैं उस से मुझ को तकलीफ़ होती है और मझ को किसी की आवाज़ सुनाई नहीं देती है।

••• ➲   हज़रत उमर ने उन साहिब को पैगाम भेज कर वहाँ वअज़ कहने से मना कर दिया, कुछ असा बाद वाइज़ साहब ने दोबारा वहाँ वअज़ कहना शुरू कर दिया,हज़रत उमर को इत्तेला हुई उन्होंने उन साहिब को पकड़ कर सज़ा दी।...✍🏻

*📒अख़ारुलमदीना ज़िल्द 1 सफ़ह 14 दारुलकुतुबुलइल्मिया,बैरुत*

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा - 04*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  04

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     ❝ लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा❞
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 मशहूर मुहद्दिश उमर बिन शुअबा रिवायत करते है !?
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••• ➲  *यानी हज़रत आइशा रदियल्लाहु तआला अन्हा ने मदीना मुनव्वरा के वाइज़ व मुक़रिर इब्ने अबी साइब से फ़रमाया।*

••• ➲  "तुम तीन चीज़ों में मेरी बात मानो वरना फिर मैं तुम से क़तअ तअल्लुक़ कर लूंगी। इब्ने अबी साइब ने कहा उम्मुलमोमिनीन!मैं आप के हुक्म की तामील करूंगा, वह बातें क्या हैं ? आप ने फ़रमाया दुआ में सजअ बन्दी से गुरेज़ करो क्यों कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहुﷺ और आप के सहाबा ऐसा नहीं करते थे और लोगों को हफ्ता में एक दिन वज़ सुनाओ और ज़्यादा चाहो दोबार और उस से भी ज़्यादा चाहो तो तीन बार और यह किताब लोगों के लिए हलाल न कर दो, और ऐसे वक़्त लोगों के पास वअज़ व तक़रीर के लिए न जाओ जब वह अपनी बात में मसरूफ़ हों और तुम जान कर उनकी बात काट दो बल्कि लोगों को उनकी हालत पर छोड़ दो फिर जब वह तुम्हें आमादा करें और तुम से कहें तो उन्हें सुनाओ।

••• ➲  यही मफहूम हज़रत सय्यदिना अब्दुल्लाह इने अब्बास रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी बुख़ारी के हवाले से *मिश्कात, किताबुल इल्म फ़स्लुस्सालिस स 360* भी देखा जा सकता है।

••• ➲  *एक और हदीस पाक हज़रत अली रज़िअल्ला तआला अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाहﷺ ने फ़रमाया।*

••• ➲  अच्छा आलिम दीन वह है कि जब लोग उसकी ज़रूरत महसूस करें तो उन्हें नफ़ा पहचाये और जब लोग उसकी तरफ़ से बे रग़बत हों तो वह भी उन से बेरगबत हो जाये।..✍🏻

*📗मिश्कात किताबुलइल्म सफ़ह - 36*

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 5-6*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  05

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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मशहूर मुहद्दिश हज़रत अता बिन अबू मुस्लिम ख़ुरासानी फरमाते है!?
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••• ➲  "आलिम को चाहिए कि उस की आवाज उस की अपनी मज्लिस से आगे न बढ़े।

*📗अदबुलइम्ला लिस्समआनी स 278 अलमतबअतुल महमूदिया,मक्कातुल मुकर्रमा*

••• ➲  *अल्लामा इब्ने आबेदीन शामी रहमतुल्लाहि तआला अलैहि फ़रमाते हैं*

*📗रद्दुल मुख़्तार किताबुलहज़र वलइंबाहा, फस्लुलबैअ 5/255 बहवाला फ़तावा रज़विया जदीद 24/90*

••• ➲  रसूलुल्लाहﷺ से मरवी है कि आप ने तिलावतेकुरआन, नमाज़, जनाज़ा, जंग और वअज़ व तक़रीर में ज़्यादा तेज़ आवाज़ का ना पसन्द फरमाया।

••• ➲  *आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ाँ बरेलवी रहमतुल्लाह अलैहि फरमाते हैं।* हदीस में है। कुछ लोगों ने चिल्ला चिल्ला कर मस्जिद में ज़िक्र करना शुरू किया तो सहाबिए रसूल हज़रत सय्यदिना अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाह तआला अन्हु ने उन्हें मस्जिद से निकलवा दिया।

*📗फतावा रज़विया 24,101*

••• ➲  *फिक्ह हन्फी की मशहूर किताब"फ़तावा हिन्दिया "किताबुलकराहिया बाब सालिस,5/374 में है।* यानी पड़ोसियों को यह हक़ हासिल है कि वह सोना कूटने वाले सुनार को इशा से तुलूऐ फजर तक मना करें बशर्त कि उन्हें उस से परेशानी होती हो।..✍🏻

*📗फतावा रज़विया जि 8 स 99 में है।*

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा -6*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  06

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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 ••• ➲  अगर कोई मस्जिद में बा आवाज़ बुलन्द दुरूद व वज़ाइफ ख़्वाह तिलावत कर रहा हो उस से अलग हो कर नमाज़ पढ़ने में भी आवाज़ कानो में पहुँचती है, लोग भूल जाते हैं, ख़्याल बहक जाता है, ऐसे मौक़े पर ज़िक्र बिलजहर तिलावत करने वाले को मना करना जाइज़ है या नहीं? यानी आहिस्ता पढ़ने को कहना बिलजहर से मना करना अगर न माने तो कहाँ तक मुमानिअत करना जाइज़ है?

*✍जवाब में इमाम अहमद रजा खान कादरी रहमतुल्लाह अलैहि फरमाते हैं।*

••• ➲   बेशक ऐसी सूरत में, जहर (ऊची आवाज़) से मना करना फक़त जाइज़ नहीं बल्कि वाजिब है कि नहीअनिल मुन्कर है और कहा तक का जवाब यह कि ता हद कुदरत जिस का बयान इस इरशादे अक़दस हुज़ूर ﷺ मे है।

📙 सही मुस्लिम, किताबुलईमान, बाब बयान कौनिन्नही अनिल मन्कर मिनल ईमान, जिल्द 1 सफ़ह 51

••• ➲   जो तुम में कोई नाजाइज़ बात देखे उस पर लाज़िम है कि अपने हाथ से मिटा दे, बन्द कर और उसकी ताक़त न पाये तो ज़बान से मना कर और अगर उसकी भी ताक़त न पाये तो दिल से बुरा जाने और यह सब में कमतर दर्जा ईमान का है।...✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 7-8*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  07

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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 ••• ➲   और जहाँ लोग अपने कामों में मशगूल हों और कुरआन मजीद के इस्तेमाअ (सनने) के लिए कोई फारिग़ न हो वहां बिलजहर तिलावत करने वाले पर उस सूरत में दोहरा वबाल। एक तो वही ख़लल अन्दाज़ी नमाज़ वगैरा के ज़िक्र जहर में था, दूसरे कुरआने अज़ीम को बे हुरमती के लिए पेश करना।

••• ➲   रद्दुलमुख़्तार में है : फ़तह में खुलासा से है, एक आदमी फिक़्ह लिख रहा है और उसके पास दूसरा शख़्स तिलावत कर रहा है जब कि कुरआन का सुनना मुम्किन नहीं तो अब गुनाह तिलावत करने वाले पर है। इसी तरह अगर ऊँची जगह पर पढ़ता है हालांकि लोग सोये हुये थे तो पढ़ने वाला गुनहगार होगा इसलिए कि यह शख़्स उनके कुरआन सुनने से ऐराज़ का सबब बना इस वजह से कि उनकी नीन्द में ख़लल वाकेअ होगा।...✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 8-9*

*👨‍💻मिन जानिब :-* सैय्यद सद्दाम अली साहब 

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🅿🄾🅂🅃 ➪  08

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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••• ➲  तिलावत करने वाले पर यह ऐहतिराम लाज़िम है कि वह बाज़ार में ऐसे मक़ामात पर न पढ़े जहां लोग मशगूल हों, अगर वह ऐसे मक़ाम पर पढ़ता है तो वह कुरआन का ऐहतिराम ख़त्म करने वाला है,लिहाज़ा दफ़ाअ हर्ज़ के पेश नज़र यह पढ़ने वाला गुनहेगार होगा, मशगूल होने वाले लोग गुनहेगार न होंगे।

*यहीं आगे एक सवाल और मजकूर है किसी ने पूछा ?*

••• ➲   क्या फ़रमाते हैं उलमाए दीन व मुफ्तियाने शरअ मतीन इस मसला में कि एक या ज़्यादा शख़्स नमाज़ पढ़ रहे हैं या बाज़ नमाज़ पढ़ने आये है और एक या कई लोग बा आवाज़े बुलन्द कुरआन या वज़ीफा यानी कोई कुरआन कोई वज़ीफा पढ़ रहा हों यहां तक मस्जिद भी गूंज रही है तो इस हाल में क्या हुक़्म होना चाहिए क्योंकि बाज़ दफा आदमी का ख़्याल बिदक जाता है और नमाज़ भूल जाता है।?

*✍जवाब में आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फरमाते हैं!*

••• ➲   जहां कोई नमाज़ पढ़ता हो या सोता हो बा आवाज़ पढ़ने से उसकी नमाज या नीन्द ख़लल आयेगा वहां कुरआन मजीद व वज़ीफा ऐसी आवाज़ से पढ़ना मना है मस्जिद में जब अकेला था और वा आवाज़ पढ़ रहा था जिस वक़्त कोई शख़्स नमाज़ के लिए आये फौरन आहिस्ता हो जाये।...✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 9-10*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  09

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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 *आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खाँ अलैहिर्रहमा एक और जगह तहरीर फरमाते है!?↲*
 
••• ➲   मगर ऐसा जहर जिस से किसी की नमाज़ या तिलावत या नीन्द में ख़लल आये या मरीज़ को ईज़ा पहुँचे नाजाइज़ है और यह भी ममनूअ है कि ताक़त से ज़्यादा जहर करे।

📙 फतावा रज़विया 23/150

••• ➲   और फ़रमाते हैं कुरआने अज़ीम की तिलावत आवाज़ से करना बेहतर है मगर न इतनी आवाज़ से कि अपने आप को तकलीफ़ या किसी नमाज़ी या ज़ाकिर के काम में ख़लल हो या किसी जाइज़ नीन्द सोने वाले की नीन्द में ख़लल आये या किसी बीमार को तकलीफ़ पहुँचे या बाजार या सराये आम या सड़क हो या लोग अपने काम काज में मशगूल हैं और कोई सुनने के लिए हाज़िर न रहेगा इन सूरतों में आहिस्ता ही पढ़ने का हुक्म है।

📗 फतावा रज़विया 23/383

••• ➲   और फ़रमाते हैं दुरूद शरीफ़ ख़्वाह कोई वज़ीफ़ा बाआवाज़ न पढ़ा जाये जब कि उसके बाइस किसी नमाज़ी या सोने वाले या किसी मरीज़ की ईज़ा हो या रिया आने का अन्देशा हो और अगर कोई महज़ूर न मौजूद हो न मज़नून तो इन्दत्तहक़ीक़ कोई हर्ज़ नहीं ता हम इख़्फा(आहिस्ता पढ़ना) अफ़ज़ल है।...✍🏻

📕 फतावा रज़विया जिल्द 6 सफ़ह 233

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 10-11*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  10

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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••• ➲   सय्यदी हुज़ूर मुफ़्तिए आज़म हिन्द रहमतुल्लाहि तआला अलैहि फरमाते है ज़िक्रे जली जाइज़ (बुलन्द आवाज़ से ज़िक्र करना) है जब कि किसी मुसल्ली (नमाज़ी) या नाइम (सोने वाले) या किसी मरीज़ की तकलीफ़ का बाइस या आराम में मुख़िल न हो।...✍🏻
 
📙 फतावा मुस्तफिया सफ़ह 500

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 11*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  11

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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                       *मशवरें*
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••• ➲  ऊपर लिखी हुई आयाते कुरआनिया और अहादीसे मुस्तफ़ाﷺ और बुजुर्गों के अक़वाल की रोशनी में आज के हालात के पेशे नज़र मैं अपने मुसलमान भाइयों को कुछ पैगाम देना चाहता हूँ और एक मैं ही नहीं आप ख़ुद भी ग़ौर करेंगे तो आप को अन्दाज़ा होगा कि आजकल प्रोग्रामों, जलसों, जुलूसों, और मस्जिदों में जो लाउडस्पीकर का इस्तेमाल हो रहा है उस में कुछ ज़्यादती ज़रूर हो रही है और कहीं कहीं उसका इस्तेमाल शरई हुदूद से और दीन की तब्लीग व इशाअत के नाम पर ख़ुदा की मख़लूक़ को परेशान करने लगे हैं या लोग अपने काम काज बात चीत और धंधों में मशगूल है उन को ज़बरदस्ती कलामे ख़ैर सुना कर उस वक़अत व अहमियत उनकी नज़रों में कम कर रहे है या उन्हें उस से मुहब्बत सिखाने के बजाये उस से चिड़ और ज़िद पैदा कर रहे हैं। दिन भर का थका हारा मज़दूर रात को बिस्तर पर आराम करने के लिए लेटा और हम ने उसके कान पर दस पाँच सुराहियाँ (लाउडस्पीकर) लगा दी वह भी घन्टे आधे घन्टे के लिए नहीं बल्कि आधी रात तक या उससे भी आगे। कोई बीमार है, किसी के सर में दर्द है, कोई दिल दिमाग का मरीज़ है, किसी के कान का पर्दा कमज़ोर है,कोई औरत दर्देज़िह में है, किसी घर में कोई सदमा है,कोई जांकनी के आलम में है,रंज व मलाल का माहौल है, कोई ज़िक्र व शुक्र व एबादत व तिलावत में है दीनी मदरसों के तालिबइल्म या स्कूलों के बच्चे अपनी किताबों के मुतालअ या इम्तिहानात की तैयारी में हैं मगर हम को इस से कोई सरोकार नहीं न किसी के दुख को दुख जाने न किसी की परेशानी को समझें,बस नाम हो गया कि फलाँ के घर पर प्रोग्राम हो रहा है या फला साहिब जलसा करा रहे हैं।...✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 11-12*

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     ❝ लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा❞
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                       *मशवरें*
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••• ➲  दस दस बीस बीस तेज़ आवाज़ वाले हारन लगा कर मज़हब के नाम पर वह काम किया जा रहा है कि आम आदमी परेशान हो जाय। या जो नमाज़ पढ़ते थे वह भी सारी रात जागने की वजह से फज्र की नमाज़ के वक़्त पड़े सोते रह जायें। ख़ास कर कमसिन बच्चों के दिल व दिमाग की नसें बहत कमज़ोर होती हैं लाउडस्पीकर की तेज आवाजें उनके लिए बहुत ज़्यादा नुकसान देह हैं और अब तो दरजनों हारन लगा कर भी तसल्ली नहीं होती जब तक ईको न लगे तब तक दीन की तब्लीग नहीं होती और मुझे बताया गया है कि ईको की आवाज़ बहुत ख़तरनाक चीज़ है कमज़ोर दिल दिमाग वालों, बीमारों बच्चों, और बुढ़ों, के लिए। में इस सिलसिले में अपने ख़्वास व अवाम मुसलमान भाइयों को कुछ मशवरा देना चाहता हूं अगर कबूल फ़रमायें तो शुक्र गुज़ार हूँगा। और ख़ैर की तौफीक़ देना अल्लाह ही का काम है।...✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 12-13*

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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*जल्सों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का तरीक़ा*
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••• ➲   मीलाद शरीफ़ की महफिलों, जलसों, कानफ्रेंसों, मुशाइरों, वगैरा में ऐसे स्पीकरों का इस्तेमाल किया जाये कि मुकर्रिरों, शाइरों व नअत ख्वानों की आवाज़ जलसागाह, हाल या पिंडाल, मकान वगैरा के अन्दर ही रहे और जो सुने उन्हें सुनाया जाये जो सुनने के लिए आमादा हैं हमारी आवाज़ उन्हीं तक पहुँचें बाहर न जाये आप हमारे मज़कूरा बयान में पढ़ चुके कि मशहूर मुहद्दिस हज़र अता बिन अबू मुस्लिम खुरसानी फरमाते थे?

*✍आलिम को चाहिए कि उसकी आवाज़ उसकी मज्लिस से आगे न बढ़े।*

••• ➲  और उम्मुलमोमिनीन सय्यदिना आइशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा के हुजराए मुबारका के क़रीब एक वाइज़ साहब जोर ज़ोर से वअज़ फरमाये तो हज़रत आइशा ने अमीरुलमोमिनीन हज़रत उमर फारूक़ से शिकायत कर के उनको सज़ा दिलवाई और उस दौर में लाउडस्पीकर भी न थे और वह साहब उनके हुजरे के क़रीब मस्जिद ही में बुलन्द आवाज़ से वअज़ व तक़रीर फ़रमाते होंगे अगर आज के जैसे तेज़ आवाज़ वाले लाउडस्पीकर और हारन होते तो उम्मलमोमिनीन उसे कैसे बरदाश्त फरमातीं। शायद कोई साहब कहें कि बाहर की आवाज़ और तेज़ हारनों के ज़रीए घरों में औरतें भी सुन लेती हैं मैं कहता हूँ कि आज कल औरतें जलसों प्रोग्रामों में आती भी तो हैं तो जब वह आती हैं तो उन के लिए मर्दों की मज्लिस के बराबर एक महफूज़ पर्दा के साथ पिंडाल बना दिया जाये और उस में एक स्पीकर लगा दिया जाये और आज कल कुछ ऐसे सिसटम भी चल गये हैं कि बगैर हारनों के कनेकशनों के ज़रीए घर घर आवाज़ प्रोग्राम रिकार्ड कर के सुनाई जा सकती है और मोबाइल की चिप बना कर भी आसानी से एक प्रोगाम लाखों तक पहुँचाया जा सकता है।...✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 13-14*

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     ❝ लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा❞
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 *जल्सों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का तरीक़ा*
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••• ➲   औरतों को सुनाने के लिए सारी मख़लूक को परेशान करने की क्या ज़रूरत है क्या औरतों को मज़हबी प्रोगाम सुनाने का यही एक रास्ता है कि दरजनों हारन लगा कर रात जो अल्लाह तआला ने आराम के लिए बनाई है उस में बूढो, बच्चों, कमज़ोरों, बीमारों और थके हारों, मज़दूरों को तड़पाया जाये और मैं पूछता हूँ कि जलसों में यह लाउडस्पीकर का रिवाज़ ज़्यादा से ज़्यादा सौ साल से चला होगा इस से पहले जो तेरह सौ साल का अर्सा गुज़र गया उस में क्या औरतों के अन्दर न दीन था न दीन दारी थी,न दीनी मालूमात? जब से लाउडस्पीकर चला है तब ही से आया औरतों में दीन?

••• ➲   कुछ लोग कहते हैं कि पता कैसे चलेगा के प्रोगाम हो रहा है तो भाइयो!इस के ज़राइ व वसाइल और भी हैं। आप ब्याह शादियों की तरह घर घर जा कर प्रोग्राम की दअवत दीजिए या पैम्फिलेट बांटियें। जुमा की नमाज़ों में मसाजिद में बता दीजिए या मस्जिदो के लाउडस्पीकरों से एलान करा दीजिए अब तो जदीद टेकनालोजी का ज़माना है सब जानते हैं कोई एलान व इश्तिहार एक मिनट में लाखों हज़ारों तक पहुँचाने के ज़राए व वसाइल मौजूद हैं।

••• ➲   मेरे इस मश्वरे से नाराज़ न हों हमारे भाई ख़ुद ग़ौर करें तो उन्हें अन्दाज़ा होगा कि आज कल जलसों प्रोग्रामों के नाम पर लाउडस्पीकर के इस्तेमाल में जो ज़्यादती हो रही हैं। उस से नफअ कम है और परेशानी ज़्यादा।...✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 14-15*

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     ❝ लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा❞
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                 *एक गाँव का वाक़िया*
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••• ➲   सुनने को मिला की गाँव मे दों हाजी साहिबान हज को तशरीफ ले जा रहे थे कि एक दिन की रवानगी थी पास पास घर थे एक ही रात में दोनों जगहो प्रोग्राम ज़्यादा से ज़्यादा हारनों का इन्तजाम था, दोनों जगह खुब कोहराम उस के घर में उसके और उसके घर में उसके हारनों की आवाज़। उनकी सौने या इनकी पल्ले नहीं पड़ रही थी और समझ में नहीं आ रही थी किसी की एक ने दूसरे से कहा कि तुम अपने हारन कम कर दो या उनका रुख दूसरी तरफ करो "दूसरे ने उस से कहा" कि तुम ऐसा करो" बात आगे बढ़ी नौबत लड़ाई झगड़े की आ गई सुना है खूब मारपीट हुई मुकर्रिर और शाइर बेचारे सब भाग गये।

••• ➲   मैं कहता हूँ अगर शरई हद में रह कर सिर्फ़ अन्दर की आवाज़ पर इक्तिफ़ा करते हुये किसी गाँव में एक रात में दस प्रोग्राम भी हों तो किसी को न कोई तकलीफ़ होगी न कोई शिकायत, बड़े सुकंन से सब हो जायेंगे और जिस को जहां जाना है वहां जा कर सुन लेगा, तो बात यह है कि इस्लाम दीने फितरत है और शरई कवानीन पर चलने में भलाई ही भलाई और ख़ैर ही ख़ैर है।...✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 16*

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     ❝ लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा❞
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                *एक गाँव का वाक़िया*
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••• ➲  एक बस्ती के लोगों ने मुझ को बताया था कि हमारे यहां इस बार पन्द्रह हाजी हज को जा रहे है और चूंकि आजकल हर हाजी के लिए प्रोग्राम कराना ज़रूरी सा हो गया है। गोया कि किसी का हज बग़ैर प्रोग्राम के हो ही नहीं सकता और प्रोग्राम भी एक दरजन हारनों के साथ तीन बजे रात से पहले ख़त्म नहीं हो सकता हज का मुबारक जमाना है लेकिन गाँव में लोग बेहद परेशान हैं।

••• ➲   कुछ बुलाये हुये और कुछ बिन बुलाये एक दरजन से कम मुक़र्रिर व शाइर भी किसी छोटे से छोटे घरेलू प्रोग्राम में नहीं होते उन में अब कुछ ऐसे भी होते हैं कि उनकी कोई सुने ना सुने वह ज़बरदस्ती सुनाने में भी माहिर हैं। रात के दो बज रहे हैं मज्लिस में सिर्फ़ दो आदमी रह गये हैं वह भी ओंघ रहे हैं मगर पढ़ने वाले ख़त्म नहीं हो रहे हैं दर असल आजकल तन्हाई में ज़िक्र व शुक्र व ऐबादत व तिलावत वाले तो न रहे सामेईन को ख़ुश करने वालों की तादाद कुछ ज़्यादा बढ़ गई है। मेरे ख़्याल में मदारिस में तो तलबा पर दौराने तालीम मुक़र्रर व शाइर बन कर कहीं जाने पर पाबन्दी होना चाहिए।

••• ➲  मेरा अन्दाज़ा, तर्जुबा और हकीक़त यह है कि अगर प्रोग्रामो में सिर्फ़ अन्दर आवाज़ वाले स्पीकर इस्तेमाल किए जायें या बिल्कुल बग़ैर लाउडस्पीकर के मुख़्तसर वक़्त में ख़त्म होने वाले प्रोग्राम किए जायें तो प्रोग्रामो की अहमियत और शान घटेगी नहीं बल्कि बढ़ेगी इन्शा अल्लाह तआला।...✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 17*

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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              *एक सुबह का इज़ाला!?*
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••• ➲  कुछ हज़रात कहते हैं कि जलसों प्रोग्रामो में बाहर आवाज़ वाले लाउडस्पीकर का इस्तेमाल तकरीबन साठ सत्तर साल से हो रहा है और ऐसे प्रोग्रामों में हमारे मशाइख़ शिरकत फरमाते थे लेकिन उन्होंने मना क्यों नहीं क्या? मैं कहता हूँ कि मशाइख़ के जमाने में न इतने तेज़ लाउडस्पीकर थे न इतने प्रोग्राम न इतने मुक़र्रिर व शाइर इसलिए उनहोंने उधर तवज्जोह न फरमाई, अब तो ख़तना हो या अक़ीक़ा, ब्याह हो या शादी,सफ़र हज हो या तीजा, दसवाँ हो या चालीसवाँ सब में घर घर प्रोग्राम ज़रूरी और हर प्रोग्राम में एक दरजन हारन ज़रूरी, और आधी रात या उसके भी बाद तक प्रोग्राम चलाना भी जरूरी मुहर्रम शरीफ़ ग्यारहवीं शरीफ बारहवीं शरीफ़ वग़ैरा के महीनों में पहले लोग मख़सूस तारीख़ पर न्याज़ व फातिहा पर इक्तिफ़ा करते थे और अब तो इन दिनों हर घर में प्रोग्राम है और महीना में शायद ही कोई दिन ऐसा होगा जिस में किसी न किसी के यहां पर प्रोग्राम न होता हो। तीज़ा चालीवाँ वग़ैरा में भी सिर्फ़ फ़ातिहा होती थी अब तो ऐसा ज़हन बन गया है कि जैसे मुरदों को भी जन्नत तब ही मिलेगी जब पूरी बस्ती को खूब बहुत से हारन लगा कर सारी रात सोने न दिया जाये।...✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 18*

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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              *एक सुबह का इज़ाला!?*
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••• ➲  अगर मशाइख़ किराम आज दीन के नाम पर इस परेशानकुन लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को मुलाहिज़ा फरमाते तो ज़रूर इस से बाज़ रखने की कोशिश फरमाते। मेरा ख़्याल तो यह है जो बखुशी सुने उन्हें सुनाया जाये और बाहर की तेज़ आवाज़ें अज़रूये शरअ मम्नू होना चाहिए। वैसे मुफ्तियाने किराम जो फ़तवा सादिर फरमायें वह मेरे लिए क़ाबिल तस्लीम है।

••• ➲   एक मशहूर व मअरूफ पाकिस्तानी सुन्नी आलि में दीन से बाहर आवाज़ फेकने वाले लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने उस से मना फरमाया। लोगों ने पूछा अगर अहले मुहल्ला से इजाज़त ले ली जाये तो उन्होंने फरमाया कि आप दो साल के बच्चे से कैसे इजाज़त लेंगे।?

*👍मुझ को उनकी यह राय और यह जवाब बहुत पसन्द आया।*

••• ➲   अभी आप हुज़ूर ﷺ की हदीस मुलाहिज़ा फरमा चुके कि आप रात को घर में दाख़िल होते तो घर वालों को आहिस्ता आवाज़ से सलाम करते ताकि जागने वाला जवाब दे और सोने वाले की नीन्द ख़राब न हो।...✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 19*

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             *एक सुबह का इज़ाला!?*
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••• ➲  आला हज़रत इमाम अहले सुन्नत की फतावा रज़विया के हवाले से आप ने पढ़ा कि उन्होंने बुलन्द आवाज़ से कुछ पढ़ने की इजाज़त जिन तीन शरतों के साथ दी उन में एक यह भी है कि "किसी जाइज़ नीन्द सोने वाले की नीन्द में ख़लल न हो" रात को बाद नमाज़े इशा जो नीन्द है वह जाइज़ है और हर इंसान का हक़ है। कुरआने करीम में कई जगह अल्लाह तआला ने उसी नीन्द और रात को अपनी नेअमत और बन्दों पर अपना ऐहसान बताया है।

••• ➲  कुरआने करीम में है खुदाए पाक इरशाद फरमाता है : अल्लाह वह है जिस ने तुम्हारे लिए रात बनाई कि उस में आराम पाओ और दिन आँखें खोलता।...✍🏻

📗 सूरए मोमिन-61

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 19*

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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            *एक सुबह का इज़ाला!?*
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••• ➲  एक जगह फरमाता है : और उस ने अपनी मेहरबानी से तुम्हारे लिए रात और दिन बनाये। ताकि तुम रात में आराम करो और दिन में उसका फज़्ल रोटी रोज़ी तलाश करो और इस लिए कि तुम उसका शुक्र करो।

📙 सूरए कसस-73

••• ➲   और उसी से पहले आयत में है : अल्लाह के सिवा और कौन ख़ुदा है जो तुम्हें रात ला दे जिस में तुम आराम करो। 

••• ➲   कुरआने करीम में एक और जगह पर है : और उस ने रात बनाई तुम्हारे सुकून के लिए।

📗सूरए इआम आयत 95

••• ➲   और एक मकाम पर फरमाता है : हम ने तुम्हारी नीन्द को आराम देने वाला बनाया और रात को पर्दा पोश किया।

📕 सूरए इन्आम आयत 109

••• ➲  कही ऐसा न हो कि आप सवाब की नियत से प्रोग्राम करते हों और लाउडस्पीकर की तेज़ आवाज़ की वजह से कोई बीमार परेशान दिन भर का थकाहारा या बीमार बिस्तर पर करवटें बदलता हो और बजाये सवाब के आप गुनाह कमा रहे हो।...✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 20*

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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 *दरगाहों और मज़ारों पर बुलन्द आवाज़े!?*
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••• ➲   अभी कुछ दिनों से देखने में आ रहा है कि किसी बुजुर्ग के मज़ार पर कोई फातिहा पढ़ रहा है कोई कुरआन की तिलावत में है कोई मुराक़िबा में, कोई किसी ज़िक्र और तस्वीह में, एक साहब आते हैं और चीख चीख़ कर नात ख़्वानी शुरू कर देते हैं या बुलन्द आवाज़ से सलात व सलाम। चन्द लोग और भी उनके साथ शामिल हो जाते हैं, फातिहा पढ़ने वालों को सख़्त दिक्क़त होती है। यह भी सही नहीं जहां और लोग आहिस्ता ज़िक्र में पहले से मशगूल हों वहां आप को भी आहिस्ता ही ज़िक्र करना है चीख़ चीख़ कर नहीं अभी आप आला हज़रत इमाम अहले सुन्नत अलैहिर्रहमा के हवाले से हदीस मुलाहिज़ा फरमा चुके कि कुछ लोगों ने चिल्ला चिल्ला कर मस्जिद में ज़िक्र करना शुरू किया तो मशहूर सहाबिए रसूल हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने उन्हें मस्जिद से बाहर निकलवा दिया।

••• ➲   ख़ुद आला हज़रत अलैहिर्रहमाके ने जिन तीन शर्तों के साथ बुलन्द आवाज़ से ज़िक्र की इजाज़त दी उन में एक यह भी है कि दूसरे के ज़िक्र व इबादत में ख़लल वाक़ेअ न हो।...✍🏻

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*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 21*

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     ❝ लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा❞
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    *दरगाहों और मज़ारों पर बुलन्द आवाज़े!?*
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••• ➲  एक मशहूर दरगाह पर मैंने ख़ुद देखा कि अन्दर ख़ास मरक़द के पास जहां बीसों लोग खड़े बैठे फातिहा व ईसाले सवाब में मशगूल थे वहां कुछ जवान नअत खां हज़रात ने आला हज़रत का मशहूर सलाम "मुस्तफा जाने रहमत पे लाखों सलाम" पढ़ना शुरू कर दिया, दरगाह के खुद्दाम ने उन्हें हाथ पकड़ कर बाहर कर दिया, बाहर निकल कर मुझ से कहने लगे यह लोग आला हज़रत के मुखालिफ हैं? मैंने दिल में कहा "हरगिज़ नहीं! यह तुम्हारी चीख़ व पुक़ार के मुखालिफ़ हैं और तुम लोग आला हज़रत और उनके मसलक के मुखालिफ़ बताने और बढ़ाने में लगे हुये हो। क्या आहिस्ता आहिस्ता दुरूद व सलाम पढ़ना नाजाइज़ है? क्या हर वक़्त हर जगह ज़ोर से पढ़ना ज़रूरी है?

••• ➲  हदीस पाक में है कि "हुज़ूर ﷺ फ़रमाते हैं कि बेहतरीन ज़िक्र वह है जो आहिस्ता हो। मसाजिद में जिस वक़्त लोग नमाज़ व एबादत में मशगूल हों बुलन्द आवाज़ से सलात व सलाम पढ़ना उलमाए अहले सुन्नत के फतवा के ख़िलाफ़ है ऐसा लगता है कि कुछ लोगों का यह नज़रिया है कि जो ख़ूब ज़ोर ज़ोर से सलात व सलाम पढ़ा जाये वह ही हुज़ूर ﷺ तक पहुंचता है! आहिस्ता से कोई पढ़े तो नहीं। या फिर मआज़ल्लाह उनका ख़्याल यह हो गया है कि आहिस्ता हुज़ूर ﷺ पर दुरूद व सलाम भेजना सुन्नियों का तरीक़ा नहीं किसी और का है। हाँ जहां आला हज़रत के बयान फरमूदा शराइत पाये जाय वहां आवाज़ के साथ पढ़ने में भी हर्ज़ नहीं।...✍🏻

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*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 22*

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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   *दरगाहों और मज़ारों पर बुलन्द आवाज़े!?*
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••• ➲  बाज़ जगह किसी बुजुर्ग के उर्स के मौक़ा पर मुसलसल कई कई दिन तक रात दिन लाउडस्पीकर ज़ारी रहता है। रात की नीन्द के अलावा दिन के काम काज, बात चीत, ख़रीद व फरोख़्त करने वालों को सख़्त परेशानी का सामना होता है। हमारे बयान 'कर्दा आयात व अहादीस, अक़वाल की रोशनी में इन हज़रात को ग़ौर करना चाहिए।

••• ➲  कुछ जलसे कराने वाले दोपहर ही से तेज़ आवाज़ वाले हारन पूरी बस्ती में फैलाकर लोगों की नाक में दम कर देते हैं। घरों में बातचीत करना दुकानों पर सौदा ख़रीदना बेचना मुश्किल हो जाता है।

••• ➲  तीजे, दसवे, चालीवें वग़ैरा की फातिहाओं में कुरआन की तिलावत ऐसे लाउडस्पीकर से नहीं होना चाहिए जिसकी आवाज़ बाहर जायें।...✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 23*

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     ❝ लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा❞
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*मसाजिद में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल तरीक़ा!?*
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••• ➲  मस्जिदों में अज़ान या किसी और एक दो मिनट के ऐलान के लिए दो या तीन हारन लगा लिए जायें तो कुछ हर्ज़ नहीं उस से ज़्यादा मुनासिब नहीं इस के एलावा वज़ व तक़रीर दर्से कुरआन व हदीस या नमाज़ जुमा के खुतबा के लिए सिर्फ़ अन्दर आवाज़ वाले स्पीकर इस्तेमाल करना चाहिए वह भी बहुत तेज़ नहीं बस लोग सुन लें इतनी आवाज़ काफी है। अकसर ऐसा होता है कि जहां कई मस्जिदें हैं किसी में लोग बा जमाअत नमाज़ अदा कर रहे हैं कहीं अज़ान शुरू हो गई, कही खुतबा शुरू हो गया, कहीं तक़रीर होने लगा, किसी मस्जिद में अभी फजर की जमाअत ख़त्म नहीं हुई है और पड़ोस की दूसरी मस्जिद से सलात व सलाम की आवाज़ आने लगी। भाइयों ! नमाज़ का ऐहतिराम बहुत ज़रूरी है उसका लिहाज़ न करना बड़ी महरूमी है, खुदाए पाक समझ अता फ़रमाये। इस्लाम में ईमान व अक़ीदा की दुरुस्तगी के बाद नमाज़ ही वह काम है जो अल्लाह तआला को सब से ज़्यादा पसन्द है यह नमाज़ खुद भी सुकून के माहौल में पढ़ो, और दूसरों को भी सुकून से पढ़ने दो। क़ुतुब फिक़्ह में लिखा है कि जहां चक्की चलती हो उस के पास नमाज़ पढ़ना मकरूह है, चक्की की आवाज़ की वजह से।...✍🏻

              *❍↬  बा - हवाला   ↫❍*

*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 23-24* 

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         📮  नेस्ट  पोस्ट  कंटिन्यू ان شاء الله
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🅿🄾🅂🅃 ➪  25

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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*मसाजिद में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल तरीक़ा!?*
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••• ➲  एक गाँव का वाक़िआ है कि वहां एक मस्जिद के इमाम साहब ना रात देखते थे न दिन जब चाहते थे मस्जिद का लाउडस्पीकर खोल कर नअत ख़्वानी शुरू कर देते थे आवाज़ इतनी तेज़ कि छोटे बच्चे सोते में चौंक जायें। घरों में एक दूसरे से या फोन पर बात करना मुश्किल।

••• ➲  जब इमाम साहब को समझाया गया तो कहने लगे कि नअत ख़्वानी हज़रत हस्सान बिन साबित रदियल्लाहु तआला अन्हु की सुन्नत है गाँव वाले बे चारे ख़ामोश हो जाते मुझ तक बात आई तो मैंने कहा कि यह हज़रत हस्सान की सन्नत हरगिज़ नही उस ज़माने में लाउडस्पीकर का तो कोई सवाल ही नहीं और इतनी ज़ोर से चीखते भी न थे कि आवाज़ मस्जिद से बाहर घरों में जाये और न वह इन लोगों को सुनाते थे जो काम काज, बात चीत में मशगूल व मसरूफ हों बल्कि मस्जिद शरीफ़ ही में जो हज़रात हुज़ूर पाक ﷺ की बारगाह में हाज़िर होते वह ही उनका कलाम सुनते थे।

••• ➲   हमारे कुछ मुक़र्रिरीन व खुतबा व नअतख्वा हज़रात बहुत ज़ोर से चीख़ चीख़ कर तक़रीर व बयान करने और नअत शरीफ़ वग़ैरा पढ़ने के आदी हो गये हैं, ख़ुद भी अपने बदन को तकलीफ़ देते हैं और दूसरो के लिए भी मुसीबत बनते हैं बहुत ज़्यादा ज़ोर लगा कर अवाज़ निकालने जिसे चीख़ना चिल्लाना कहते हैं यह तो इस्लाम में मुतलकन ममनूअ है। यहां तक कि आज़ान में भी हाँ बाज़ शरतों के साथ जहर यानी बुलन्द आवाज़ से पढ़ने की इजाज़त है लेकिन चीखने चिल्लाने की नहीं और दीन की तब्लीग दहाड़ने, चीखने चिल्लाने से नहीं होती। प्यार व मुहब्बत के साथ समझाने से होती है। अभी आप आला हज़रत इमाम अहले सुन्नत अलैहिर्रहमा कि फरामीन में पढ़ चुके कि ताक़त से ज़्यादा जहर करना और इतनी आवाज़ से पढ़ना कि खुद अपने आप को तकलीफ़ हो यह भी मम्नूअ है।...✍🏻

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*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 24-25*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  26

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     ❝लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा ❞
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*सेहरी के वक़्त लाउडस्पीकर का बेजा इस्तेमाल!?*
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••• ➲  आज कल रमज़ान शरीफ़ के महीना में सेहरी खाने के लिए लोगों को मस्जिदों के लाउडस्पीकरों के ज़रीआ बेदार किया जाता है। कुछ इमाम साहिबान दो घन्टे पहले से लाउडस्पीकर खोल कर तक़रीरों और नअतों की रिकार्डिग शुरू कर देते हैं यह भी सही तरीक़ा नहीं। बाज़ बस्तियों और मुहल्लों में कई कई मस्जिदो से यह तेज़ आवाज़ वाले लाउडस्पीकरों के ज़रीआ रिकार्डिंग शुरू हो जाती हैं हंगामा और शोर के सिवा कुछ समझ में नहीं आता इस पर फौरन रोक लगाना ज़रूरी है। हल्की आवाज़ वाले लाउडस्पीकर का इस्तेमाल किया जाये, ख़त्मे सेहरी से सिर्फ़ एक घन्टा पहले लोगों को जगाया जाये, सेहरी पकाने खाने के लिए इतना टाइम काफी है। रिकार्डिग बिल्कुल न की जाये दो तीन बार वक़्त बता दिया जाये कि अब इतना टाइम सेहरी ख़त्म होने में बाकी है इस से ज़्यादा लाउडस्पीकर का इस्तेमाल रात में बेज़रूरत और मख़लूक को परेशान करना है। बुढे, बच्चे, बीमार, कमज़ोर और कुछ औरतें जिन पर रोज़ा फर्ज़ नहीं उन की नीन्द को ख़राब करना मज़हब के नाम पर यह मज़हबियत और दीनदारी नहीं है।...✍🏻

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*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 26* 

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     ❝ लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा❞
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 *सेहरी के वक़्त लाउडस्पीकर का बेजा इस्तेमाल!?*
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••• ➲  कुछ इमाम हज़रात फजर की नमाज़ के बाद लाउडस्पीकरों से नअत या तक़रीर की रिकार्डिग शुरू कर देते हैं। हांलाकि यह ज़िक्र व तस्वीह का वक़्त है।

••• ➲   हमारा मज़हब ग़ैर मुस्लिमों को भी परेशान करने की इजाज़त नहीं देता वह अपने मज़हब के नाम पर कुछ भी करें उस के जिम्मदार वह है लेकिन हमारी जिम्मेदारी यह है कि हमारे मज़हब का ग़लत तआरूफ न हो और हमारा शुमार उन लोंगो मे न हो जो धरम और मज़हब का नाम लेकर ख़ल्क ख़ुदा के लिए मुसीबत बनते हैं।

••• ➲   ग़ैर मुस्लिमों को भी चाहिए कि वह अपने धरम के नाम पर अवाम को परेशान न किया करें में समझता हूँ कोई भी मज़हब इसकी इजाज़त नहीं देता आजकल लाउडस्पीकर की तेज़ आवाजे और मज़हब के नाम पर रास्ते जाम करने का जो रिवाज़ बढ़ता जा रहा है इस पर सब कन्ट्रोल करना चाहिए और एक दूसरे की चिढ़ और ज़िद में ख़ुदा की मख़्लूक को परेशान नहीं करना चाहिए।...✍🏻

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*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 27*

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🅿🄾🅂🅃 ➪  28

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     ❝ लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा❞

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*मौलाना तत्हीर साहब की एक वसीयत!?*

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••• ➲  मैंने वसीयत की है कि मेरे मरने के बाद चालीसवीं वग़ैरा के मौक़े पर बाहर आवाज़ फेंकने वाले लाउडस्पीकर लगा कर कोई प्रोग्राम न किया जाये। ख़्वाह वह प्रोग्राम दिन में हो या रात में।

••• ➲  मेरी तदफ़ीन आम मुसलमानो की तरह की जाये क़ब्र पर कोई इमारत न बनाई जाये सालाना फातिहा अगर हो तो उसका नाम उर्स न रखा जाये, बल्कि बरसी कहा जाये। अल्लाह तआला अपने करम व फज़ल से गुनाहों को मुआफ़ कर के मग़फिरत फरमादे यहीं बड़ा मर्तबा है। क़ियामत के दिन अपने महबूब सय्यदे आलम अहमद मुज्तबा मुहम्मद मुस्तफा ﷺ की शफाअत से जन्नत में थोड़ी सी जगह अता फरमा दे तो हमारे जैसे बड़े बड़े गुनाहगारों, ख़ताकारो, इसयाँ शिआरो दुनियादारो के लिए यह बहुत काफ़ी है और उसका फज़्ले अज़ीम है कि बेशुमार गुनाहो, ख़ताओं के बावजूद में उसकी रहमत से ना उमीद नहीं क्योंकि वह बहुत बख्शने वाला मेहरबान परवरदिगार (अरहमुर्रराहमीन) है और उस ने अपने महबूबﷺ को (रहमतुल लिल आलमीन) बनाकर भेजा है।...✍🏻

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*📬 लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का सही तरीक़ा सफ़हा 27-28*

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*📬 पोस्ट मुकम्मल हुई अल्हम्दुलिल्लाह 🔃*
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