Wednesday, 3 November 2021

शान ए गौसे आज़म रादिअल्लाहु तआला अन्हु

 



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❝ 👑 शान ए गौसे आज़म रादिअल्लाहु तआला अन्हु ❞
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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

               *❝  एहसाने अज़ीम ❞* 
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࿐   ऐ आशिकाने गौसे आज़म ! अल्लाह पाक का हम अहले सुन्नत पर बड़ा फ़ज़्लो करम है कि उस ने हमें अपने औलियाए किराम रादिअल्लाहु तआला अन्हुम की इज्जतो ता'ज़ीम करने आ 'रास मनाने मज़ाराते मुबारका पर हाज़िरी देने और इन की सीरत बयान करने की तौफीक अता फ़रमाई है। 

࿐   औलियाए किराम अल्लाह पाक के पसन्दीदा बन्दे होते हैं इन की सारी ज़िन्दगी अल्लाह व रसूल की याद में गुज़रती है हमें भी इसी तरह शरीअत के मुताबिक ज़िन्दगी गुज़ारनी चाहिये। 

࿐   अल्लाह पाक अपने इन नेक बन्दों औलियाए किराम पर अपनी रहमतों की बरसात फ़रमाता रहता है औलियाए किराम की शानो अज़मत के लिये येह कुरआनी आयत ही काफ़ी है।

࿐   अल्लाह पाक ने अपने पसन्दीदा बन्दों का ज़िक्र ग्यारहवें पारे के बारहवें रुकूअ में फ़रमाया है चुनान्चे पारह 11 सूरए यूनुस आयत नम्बर 62 में इर्शाद होता है : तरजमए कन्जुल ईमान : सुन लो बेशक अल्लाह के वलियों पर न कुछ ख़ौफ़ है न कुछ गुम। 

࿐   सहाबी इब्ने सहाबी ,जन्नती इब्ने जन्नती हज़रते सय्यदुना अब्दुल्लाह बिन अब्बास रादिअल्लाहु तआला अन्हु इस आयत की तफ्सीर में फ़रमाते हैं : “औलियाए किराम पर दुन्या में कोई ख़ौफ़ नहीं ,न ही वोह आख़िरत में ग़मगीन होंगे बल्कि अल्लाह पाक खुशी व इज़्ज़त के साथ उन का इस्तिकबाल फ़रमाएगा और उन्हें हमेशा रहने वाली ने' मतें आता फ़रमाएगा।..✍🏻

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 *📬 फ़ैज़ाने ग़ौसे आज़म सफ़ह - 01,02 📚*

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   ❝ 👑 शान ए गौसे आज़म रादिअल्लाहु तआला अन्हु ❞
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   ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

               *❝  तआरुफे गौसे आज़म  ❞* 
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࿐   ऐ आशिकाने गौसे आज़म ! माहे फ़ाख़िर , रबीउल आखिर में यूं तो दीगर बुजुर्गों के उर्स भी हैं मगर येह महीना हुज़ूरे गौसे पाक से ख़ास निस्बत रखता है और इस महीने की 11 तारीख़ को हुजूरे गौसे पाक शैख़ अब्दुल कादिर जीलानी का उर्स शरीफ़ मनाया जाता है।

࿐   हमारे प्यारे प्यारे पीरो मुर्शिद सय्यिदी हुज़ूर गौसे पाक बड़े वलिय्युल्लाह बल्कि वलियों के भी सरदार हैं आप रादिअल्लाहु तआला अन्हु का मुबारक नाम अब्दुल कादिर , कुन्यत अबू मुहम्मद और अल्काबात मुहूयुद्दीन, महबूबे सुब्हानी, गौसुस्सकलैन, गौसुल आज़म वगैरा हैं आप 470 हिज़री में बगदाद शरीफ़ के करीब क़स्बा " जीलान " में रमजानुल मुबारक की पहली तारीख को पैदा हुए और 561 हिज़री में बगदाद शरीफ ही में विसाल फ़रमाया आप का मज़ारे पुर अन्वार इराक़ के मशहूर शहर बगदाद शरीफ में है।

࿐   गौसिय्यत बुज़ुर्गी का एक खास दर्जा है लफ़्ज़े "गौस" के लुगवि माना है "फरियाद-रस यानी फ़रियाद को पहुचने वाला" चुकी हज़रते शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैहे गरीबो, बे कसो और हाजत मन्दो के मददगार है इसलिए आप को ग़ौसे आ'ज़म के खिताब से सरफ़राज़ किया गया और बाज़ अक़ीदत मन्द आपको "पिराने पिर दस्त-गिर" के लक़ब से भी याद करते है।..✍🏻

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 *📬 फ़ैज़ाने ग़ौसे आज़म सफ़ह - 02,03 📚*

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 ❝ 👑 शान ए गौसे आज़म रादिअल्लाहु तआला अन्हु ❞
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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

            *❝  ग़ौसे पाक का नसब शरीफ ❞* 
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࿐   आप रहमतुल्लाह अलैहे वालीदे मजीद की निस्बत से ह-सनी है,!

सिलसिलए नसब यु है :-

सय्यिद मुहयुद्दीन अबू मुहम्मद अब्दुल क़ादिर बिन
सय्यिद अबू सालेह जंगी दोस्त बिन
सय्यिद अबू अब्दुल्लाह बिन
सय्यिद याहया बिन
सय्यिद मुहम्मद बिन
सय्यिद दावूद बिन
सय्यिद मूसा सानी बिन
सय्यिद अब्दुल्लाह बिन
सय्यिद मूसा जौन बिन
सय्यिद अब्दुल्लाह महज़ बिन
सय्यिद इमाम हसन मुसन्ना बिन
सय्यिद इमामे हसन बिन
सय्यिदुना अलिय्युल मुर्तज़ा

࿐   और आप रहमतुल्लाह अलैहे अपनी वालिदए माजिदा की निस्बत से हुसैनी सय्यिद है।

࿐   *ग़ौसे पाक के आबाओ अज्दाद :-* आप रहमतुल्लाह अलैहे का खानदान सालीहीन का घराना था आप के नानाजान, दादाजान, वालीदे माजिद, वालिदए मोहतरमा, फुफिजान, भाई और साहिब जा-दगान सब मुत्तक़ी व परहेज़ गार थे, इसी वजह से लोग आप के खानदान को अशराफ का खानदान कहते है।

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*📬 गौसे पाक के हालात सफ़ह - 16,17 📚*

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 ❝ 👑 शान ए गौसे आज़म रादिअल्लाहु तआला अन्हु  ❞
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   ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

         *❝  ग़ौसे पाक के वालीदे मोहतरम ❞* 
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࿐   आप रहमतुल्लाह अलैहे के वालीदे मोहतरम हज़रते अबू सालेह सय्यिद मूसा जंगी दोस्त रहमतुल्लाह अलैहे थे, आप का इसमें गिरामी "सय्यिद मूसा" कून्यत "अबू सालेह" और लक़ब "जंगी दोस्त" था, आप जिलान शरीफ के अकाबिर मशाईखे किराम में से थे।

࿐   जंगी दोस्त लक़ब की वजह :-* आप रहमतुल्लाह अलैहे का लक़ब जंगी दोस्त इस लिये हुवा की आप खली-सतन अल्लाह की रिज़ा के लिये नफ़्स कुशी और रियाज़ते शर-ई में यकताए ज़माना थे! नेकी के कामो का हुक्म करने और बुराई से रोकने के लिये मश्हूर थे!

࿐   ग़ौसे पाक के नानाजान :-* हुज़ूर सय्यिदुना गौसुल आ'ज़म रहमतुल्लाह अलैहे के नानाजान हज़रते अब्दुल्लाह सौमई रहमतुल्लाह अलैहे जिलान शरीफ के मशाइख में से थे, आप निहायत ज़ाहिद और परहेज़ गार होने के इलावा साहिबे फ़ज़्लो कमाल भी थे, बड़े बड़े मशाईखे किराम से आप ने शरफे मुलाक़ात हासिल किया।

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    *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 17 📚*

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••──────────────────────••► ❝ 👑 शान ए गौसे आज़म रादिअल्लाहु तआला अन्हु  ❞
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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

    *❝ ग़ौसे पाक की विलादत की बिशारत  ❞* 
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*࿐   सरकार ﷺ की बिशारत :-* महबूबे सुब्हानी, शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी के वालीदे मजीद हज़रते सय्यिदुना अबू सालेह मूसा जंगी दोस्त राह्मतुल्लाहे तआला ने हुज़ूर गौसे आ'ज़म अलैहिर्रहमा की विलादत की रात मुशाहदा फ़रमाया की सरवरे काइनात, फ़ख़रे मौजूदात ﷺ मअ सहाबाए किराम और औलियाए इज़ाम उनके घर जल्वा अफ़रोज़ है और इन अल्फ़ाज़े मुबारका से उन को खिताब फरमा कर बिशारत से नवाज़ा :

࿐    ऐ अबू सालेह ! अल्लाह عزوجل ने तुम को ऐसा फ़रज़न्द अता फ़रमाया है जो वाली है और वो मेरा और अल्लाह عزوجل का महबूब है और उसकी औलिया और अक़्ताब में वैसी ही शान होगी, जेसी अम्बिया और मुरसलीन अलैहिसलातु वस्सलाम में मेरी शान है।

*࿐   अम्बियाए किराम की बिशारत :-* हज़रते अबू सालेह मूसा जंगी दोस्त रहमतुल्लाह अलैह को ख्वाब में शहंशाहे अरबो अ'ज़म के इलावा जुम्ला अम्बियाए किराम अलैहिमुस्सलाम ने ये बिशारत दी की "तमाम औलियाउल्लाह तुम्हारे फऱज़न्दे अर्जुमंद के मुतीअ होंगे और उन की गर्दनो पर इनका क़दम मुबारक होगा।

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 *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 22,23 📚*

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❝👑 शान ए गौसे आज़म रादिअल्लाहु तआला अन्हु   ❞
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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

    *❝ ग़ौसे पाक की विलादत की बिशारत  ❞* 
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*࿐   हज़रते हसन बसरी की बिशारत :-* जिन मशाइख ने हज़रते ग़ौसे आ'ज़म रहमतुल्लाह अलैह की क़ुतबिय्यत के मर्तबे की गवाही दी है "रौ-ज़तुन्नवाज़िर" और "नूज़हतुल खवातिर" में साहिबे किताब उन मशाइख का तज़्क़िरा करते हुए लिखते है : आप रहमतुल्लाह अलैह से पहले अल्लाह के औलिया में से कोई भी आप का मुन्किर न था बल्कि उन्होंने आप की आमद की बिशारत दी!

࿐   चुनान्चे हज़रत हसन बसरी ने अपने ज़मानए मुबारक से ले कर हज़रते शैख़ मुहीउद्दीन अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह के ज़मानए मुबारक तक तफ़सील से खबर दी की जितने भी अल्लाह के औलिया गुज़रे है सब ने शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी की खबर दी है।

*࿐  हज़रते जुनैद बगदादी की बिशारत :-* आप रहमतुल्लाह अलैह इर्शाद फरमाते है की "मिझे आ'लमे गैब से मालुम हुवा है की पाचवी सदी के वस्त में सय्यिदुल मुर-सलीन की औलादे अतहार में से एक कुत्बे आ'लम होगा, जिन का लक़ब मुहीउद्दीन और इस्मे मुबारक अब्दुल क़ादिर है और वो ग़ौसे आ'ज़म होगा और जिलान में पैदा होगी!

࿐  उनको खतमुन्नबीय्यिन की औलादे अतहार में से आइम्मए किराम और सहाबाए किराम के इलावा अव्वलिनो आखिरिन के "हर वाली और वालिय्या की गर्दन पर मेरा क़दम है। कहने का हुक्म होगा।

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 *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 22,23 📚*

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   ❝  👑 शान ए गौसे आज़म रादिअल्लाहु तआला अन्हु ❞
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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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*❝ ग़ौसे आ'ज़म की वक़्ते विलादत करामत का ज़ुहर ❞* 
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࿐   आप रहमतुल्लाह अलैह की विलादत माहे रमज़ानुल मुबारक में हुई और पहले दिन ही रोज़ा रखा। सहरी से ले कर इफ्तारी तक आप अपनी वालिदए मोहतरमा का दूध न पिटे थे,

࿐   चुनान्चे गौसुस्स-क़लैन् शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह की वालिदए माजिदा फरमाती है की जब मेरा फ़रज़न्द अर्जुमन्द पैदा हुवा तो रमज़ान शरीफ में दिन भर दूध न पिटा था।

*࿐   आप के बचपन की बरकतें :-* आप की वालिदए माजिदा फरमाया करती थी : जब मेने अपने साहिब ज़ादे अब्दुल क़ादिर को जना तो वो रमज़ानुल मुबारक में दिन के वक़्त मेरा दूध नहीं पिता था।

࿐   अगले साल रमज़ान का चांद गुबार की वजह से नज़र न आया तो लोग मेरे पास दरयाफ़्त करने के लिये आए तो मेने कहा "मेरे बच्चे ने दूध नहीं पिया" फिर मालुम हुआ की आज रमज़ान का दिन है और हमारे शहर में ये बात मशहूर हो गई की सय्यिदो में एक बच्चा पैदा हुआ है जो रमज़ान में दिन के वक़्त दूध नहीं पिता।

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 *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 24,25 📚*
 

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              *❝ हैरत अंगेज़ वाकीआत ❞* 
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࿐   हज़रते सय्यिदुना अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाहि तआला अलैहे की विलादत बा सआदत के वक़्त बहुत से हैरत अंगेज़ वाकीआत ज़ुहर पज़ीर हुवे।

࿐   सबसे बड़ी बात तो ये है की जब आप रौनक अफरोज़ आलम हुवे उस वक़्त आप की वालिदए माजिदा हज़रते उम्मुल खैर फ़ातिमा की उम्र 60 साल की थी, इस उम्र में आम तौर पर औरतो को अवलाद से ना उम्मीदी हो जाती है, ये अल्लाह का खास फ़ज़्ल था की इस उम्र में हुज़ूर गौसे आ'ज़म रहमतुल्लाहि तआला अलैहे उनके बतने मुबारक से पैदा हुवे।

࿐   जिस रात हज़रते सय्यिदुना अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह तआला अलैहे की विलादत हुई, उस रात जिलान शरीफ की जिन औरतो के यहाँ बच्चा पैदा हुवा उन सब को अल्लाह ने लड़का ही अता फ़रमाया और हर नव मौलूद लड़का अल्लाह का वाली बना।

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     *📬 ग़ौसे पाक का बचपन सफ़ह - 7 📚*

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   ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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              *❝ खेल कूद से बे रागबति ❞* 
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࿐   देखा जाता है की बचपन में उमुमन बच्चे खेल कूद की तरफ रागिब होते है और पढाई से दूर भागते है जब की हमारे गौसे पाक की शान तो देखिये की बचपन ही से आप को खेल कूद से कोई रगबत नहीं थी  निहायत साफ सुथरे रहते और ज़बाने मुबारक से कभी कम अक्लि की बात न निकली था।

࿐   अपने लड़कपन के मुतअल्लिक़ खुद इर्शाद फरमाते है की उम्र के इब्तिदाई दौर में जब कभी में लड़को के साथ खेलना चाहता तो गैब से आवाज़ आती थी की "खेल कूद से बाज़ रहो" जिसे सुनकर में रुक जाया करता था और अपने गिर्दो पेश पर नज़र डालता तो मुझे कोई कहने वाला दिखाई न देता था, जिससे मुझे दहशत सी मालूम होती, में जल्दी से भागता हुवा घर आता और वालिदए मोहतरमा की आगोशे महब्बत में छुप जाता था।

࿐   अब वोही आवाज़ में अपनी तन्हाइयो में सुना करता हु, अगर मुझे नींद नहीं आती है तो फौरन मेरे कानो में आ कर मुझे मुतनब्बेह (खबरदार) कर देती है की "तुम को इस लिये पैदा किया गया है की तुम सोया करो।"

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     *📬 ग़ौसे पाक का बचपन सफ़ह - 12 📚*

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                *❝ शीकमे मादर में इल्म ❞* 
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࿐   5 बरस की उम्र में जब पहली बार बिस्मिल्लाह पढ़ने की रस्म के लिये किसी बुज़ुर्ग के पास बैठे तो बिस्मिल्लाह पढ़ कर सूरए फातिहा और अलिफ़-लाम-मिम से लेकर 18 पारे पढ़ कर सूना दिये।

࿐   उन बुज़ुर्ग ने कहा बेटा ! और पढ़िये।

࿐   फ़रमाया : बस मुझे इतना ही याद है क्यू की मेरी माँ को भी इतना ही याद था जब में अपनी माँ के पेट में था उस वक़्त वो पढ़ा करती थी, मेंने सुन कर याद कर लिया था।

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     *📬 ग़ौसे पाक का बचपन सफ़ह - 15 📚*

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          *❝ अपनी विलायत का इल्म होना ❞* 
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࿐   हज़ूर गौसे आ'ज़म फरमाते है की जब में बचपन के आ'लम में मदरसे को जाया करता था तो रोज़ाना एक फरिश्ता इंसानी शक्ल में मेरे पास आता और मुझे मदरसे ले जाता, खुद भी मेरे पास बैठा रहता था, में उसे मुतलकन नहीं पहचानता था की ये फरिश्ता है।

࿐   एक दिन मेने उससे पूछा : आप कौन हो ? तो उसने जवाब दिया की में फरिश्तों में से एक फरिश्ता हु, अल्लाह तआला ने मुझे इस लिये भेजा है की मदरसे में आप के साथ रहा करू।

࿐   इसी तरह आप फरमाते है, की एक रोज़ मेरे क़रीब से एक शख्स गुज़रा जिस को में बिलकुल न जनता था, उसने जब फरिश्तों को ये कहते सुना की कुशादा हो जाओ ताकि अल्लाह का वाली बैठ जाए, तो उसने फ़रिश्ते से पूछा की ये लड़का किस का है ? तो फ़रिश्ते ने जवाब दिया की ये सादात के घराने का लड़का है, तो उसने कहा की ये अं क़रीब बहुत बड़ी शान वाला होगा।

࿐   आप राह्मतुल्लाहअलैहे के साहिब ज़ादे शैख अब्दुर्रज़्ज़क रहमतुल्लाहअलैहे का बयान है की एक दफा हुज़ूर गौसे आ'ज़म से दरयाफ़्त किया गया की आप को अपने वाली होने का इल्म कब हुवा?

࿐   तो आप ने फ़रमाया की जब में दस बरस का था और अपने शहर के मकतब में जाया करता था और फरिश्तों और को अपने पीछे और इर्द गिर्द चलते देखता, जब मकतब में पहुच जाता तो वो बार बार ये कहते की अल्लाह के वाली को बैठने के लिये जगह दो।

࿐   इसी वाकिए को बार बार देख कर मेरे दिल में ये एहसास पैदा हुवा की अल्लाह तआला ने मुझे दर्जए विलायत पर फाइज़ किया है।

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     *📬 ग़ौसे पाक का बचपन सफ़ह - 18 📚*

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   ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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*❝ बचपन में राहे खुदा के मुसाफिर बन गए ❞* 
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࿐   गौसे पाक बचपन ही में इल्मे दिन हासिल करने के लिये राहे खुदा के मुसाफिर बन गए थे। चुनान्चे हज़रत शैख़ मुहम्मद बिन क़ाइद अवानी फरमाते है की हज़रत गौसे आ'ज़म जिलानी ने हम से फ़रमाया की बचपन में हज के दिन मुझे एक मर्तबा जंगल की तरफ जाने का इत्तिफ़ाक़ हुवा और में एक बैल के पीछे पीछे चल रहा था की उस बैल ने मेरी तरफ देख कर कहा :

࿐   ऐ अब्दुल क़ादिर तुम्हे इस किस्म के कामो के लिये तो पैदा नहीं किया गया ! में घबरा कर घर लौटा और अपने घर की छत पर चढ़ गया तो क्या देखता हु की मैदाने अरफात में लोग खड़े है, इसके बाद मेने अपनी वालिदए माजिदा की खिदमते अक़्दस में हाजिर हो कर अर्ज़ किया :

࿐   आप मुझे रहे खुदा में वक़्फ़ फरमा दे और मुझे बगदाद जाने की इजाज़त मर्हमत फरमाए ताकि में वहा जा कर इल्मे दिन हासिल करू।

࿐   वालिदा माजिदा ने मुझसे इसका सबब दरयाफ़्त किया, मेने बैल वाला वाक़ीआ अर्ज़ कर दिया तो उन की आँखों में आसु आ गए और वो 80 दिनार  जो मेरे वालीदे माजिद की विरासत थे, मेरे पास ले आई तो मेने उनमेसे 40 दिनार ले लिये और 40 दिनार अपने भाई सय्यिद अबू अहमद के लिये छोड़ दिये।

࿐   वालिदए माजिदा ने मेरे 40 दिनार मेरी गुदड़ी में सी दिये और मुझे बगदाद जाने की इजाज़त इनायत फरमा दी। उन्होंने मुझे हर हाल में रास्तागोइ और सच्चाई को अपनाने की ताकीद फ़रमाई और जिलान के बाहर तक मुझे अल वदाअ कहने के लिये तशरीफ़ लाइ और फ़रमाया :

࿐   ऐ मेरे प्यारे बेटे ! में तुझे अल्लाह की रिजा और ख़ुशनूदी की खातिर अपने पास से जुदा करती हु और अब मुझे तुम्हारा मुह कियामत को ही देखना नसीब होगा।

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  *📬 ग़ौसे पाक का बचपन सफ़ह - 19-20 📚*

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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

                *❝ शौके इल्मे दीन ❞* 
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࿐   हज़रते सय्यिदुना शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी अलैरहमा के इल्मे दिन हासिल करने का अंदाज़ बड़ा निराला था, आप के शौके इल्मे दिन का अंदाज़ इस बात से लगाइये की आप फरमाते है : मैं अपने तालिबे इल्म के ज़माने में असातिज़ा से सबक ले कर जंगल की तरफ निकल जाया करता था, फिर बयाबानो और विरानो में दिन हो या रात, अंधी हो या मूसलधार बारिश, गर्मी हो या सर्दी अपना मुताअला जारी रखता था।

࿐   उस वक़्त में अपने सर पर एक छीटा सा इमाम बंधता और मामूली तरकारियां खा कर शिकम की आग सर्द करता, कभी कभी ये तरकारियां भी हाथ न आती, क्यू की भूक के मारे हुवे दूसरे फकरा भी इधर का रुख कर लिया करते थे।

࿐   ऐसे अवकेअ पर मुझे शर्म आती थी की में दरवेशों की हक़ तलफि करु, मजबूरन वहा से चला जाता और अपना मुताअला जारी रखता, फिर नींद आती तो खली पेट ही कंकरियो से भरी हुई ज़मीन पर सो जाता।

࿐   आप अपने इसी ज़मानए तालिबे इल्मी के बारे में फरमाते है : में ज़माने की जिन सख्तियो से दो चार हुवा, उन्हें बर्दाश्त करते करते पहाड़ भी फट जाता, ये तो उस ज़ाते बे नियाज़ का काम है की में बी आफिय्यत उन खारज़ारो (काँटेदार जंगलो) से गुज़र गया।

              *✐°°•. बाकी अगली पोस्ट में पढ़ें!*

    *📬 ग़ौसे पाक का बचपन सफ़ह - 20 📚*

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   ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

*❝ ग़ौसे पाक का इल्मो अ'मल और तक़्वा व परहेज़ गारी ❞* 
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࿐   हज़रते शैख़ इमाम मौक़ीफ़ुद्दीन बिन क़ीदामा रहमतुल्लाह अलैह फरमाते है की हम 561 ही. में बगदाद शरीफ गए तो हमने देखा की शैख़ सय्यिद अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह उन्मे से है की जिन को वहा पर इल्म, अ'मल और हाल व फतवा नवीसी की बादशाहत दी गई है।

࿐   कोई तालिबे इल्म यहाँ के इलावा किसी और जगह का इरादा इसलिये नहीं करता था की आप में तमाम उलूम जमा है और जो आप से इल्म हासिल करते थे आप उम् तमाम तलबा के पढ़ाने में सब्र फरमाते थे।

࿐   आप का सीना फराख़ था और आप सैर चश्म थे, अल्लाह ने आप में औसाफे जमीला और अहवाले अ'ज़िज़ा जमा फरमा दिये थे।

              *✐°°•. बाकी अगली पोस्ट में पढ़ें!*

    *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 28 📚*

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

       *❝  तेरह उलूम में तक़रीर फरमाते! ❞* 
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࿐  इमाम रब्बानी शैख़ अब्दुल वह्हाब शारानी और शैखुल मुहद्दिसिन अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी और अल्लामा मुहम्मद बिन यहया हबली रहमतुल्लाह अलैह तहरीर फरमाते है की : हज़रते अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह तेरह उलूम में तक़रीर फ़रमाया करते थे।

࿐  एक जगह अल्लामा शारानी फरमाते है की ग़ौसे पाक के मद्रसए आलिया में लोग आप से तफ़्सीर, हदिष, फिक़्ह और इल्मुल कलाम पढ़ते थे, दोपहर से पहले और बाद दोनों वक़्त लोगो को तफ़्सीर, हदिष, फिक़्ह, कलाम, उसूल और नहव पढ़ाते थे और ज़ोहर के बाद किरआतो के साथ क़ुरआन पढ़ते थे।

              *✐°°•. बाकी अगली पोस्ट में पढ़ें!*

    *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 28 📚*

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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

          *❝ 🔮 इल्म का समुन्दर 🔮 ❞* 
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࿐   शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस दहेल्वी रहमतुल्लाह अलैह ग़ौसे पाक के इल्मी कमालात के मुतअल्लिक़ एक रिवायत नक़ल करते है की : एक रोज़ किसी क़ारी ने आप की मजलिस शरीफ में क़ुरआन की एक आयत तिलावत की तो आप ने उस आयत की तफ़्सीर में पहले एक मानी फिर दो इसके बाद तिन यहाँ तक की हाज़िरीन के इल्म के मुताबिक़ आप ने उस आयत के 11 मआनी बयान फ़रमा दिये।

࿐   और फिर दीगर वुजूहात बयान फ़रमाई जिन की तादाद 40 थी और हर वजह की ताईद में इल्मी दलाइल बयान फ़रमाए और हर मानी के साथ सनद बयान फ़रमाई ग़ौसे पाक रहमतुल्लाह अलैह के इल्मी दलाइल की तफ़सील से सब हाज़िरीन मुतज्जीब हुए।

              *✐°°•. बाकी अगली पोस्ट में पढ़ें!*

    *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 29 📚*

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   ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

*❝ एक आयत के चालीस मआनी बयान फरमाए ❞* 
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࿐   हाफ़िज़ अबुल अब्बास अहमद बिन अहमद बगदादी बनदलजी रहमतुल्लाह अलैह ने साहिबे बहजतुल असरार से फ़रमाया : मैं और तुम्हारे वालिद एक दिन हज़रते शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह की मजलिस में हाज़िर हुए आप ने एक आयत की तफ़्सीर में एक मानी बयान फ़रमाया तो मेने तुम्हारे वालिद से कहा : ये मानी आप जानते है?

࿐   आप ने फ़रमाया : हा फिर ग़ौसे पाक ने दूसरा मानी बयान फ़रमाया तो मेने दोबारा तुम्हारे वलीद से पूछा की क्या आप इस मानी को जानते है?

࿐   तो उन्होंने फ़रमाया हा : फिर आप ने एक और मानी बयान फ़रमाया तो मेने तुम्हारे वालिद से पूछा की आप इस मानी को जानते है।

࿐   ईसके बाद आप ने 11 मआनी बयान किये और में हर बार तुम्हारे वालिद से पूछता था, और वो यही कहते की इन मानो से में वाक़ीफ़ हूँ यहाँ तक की ग़ौसे पाक ने पुरे 40 माना बयान किये जो निहायत उम्दा और अज़ीज़ थे 11 के बाद हर मानी के बारे में तुम्हारे वालिद कहते थे : में इन मानो से वाक़ीफ़ नहीं हूँ।

              *✐°°•. बाकी अगली पोस्ट में पढ़ें!*

    *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 29 📚*

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*❝ हज़रत इमाम अहमद बिन हम्बल का इज़हारे अक़ीदत ❞* 
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࿐   हज़रत शैख़ इमाम अबूल हसन अली बिन अल हैती रहमतुल्लाह अलैह फरमाते है की मेने हज़रये शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह और शैख़ बक़ा बिन बतौ के साथ हज़रते इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैह के रौजए अक़्दस की ज़ियारत की।

࿐   मैंने देखा की हज़रते इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैह क़ब्र से बहार तशरीफ़ लाए और हुज़ूर ग़ौसे पाक को अपने सीने से लगा लिया और उन्हें खलअत पहना कर इर्शाद फ़रमाया : ऐ शैख़ अब्दुल क़ादिर ! बेशक में इल्मे शरीअत, इल्मे हक़ीक़त, इल्मे हाल और फेले हाल में तुम्हारा मोहताज हूँ।

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    *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 30 📚*

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   ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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    *❝ मुश्किल मसअले का आसान जवाब ❞* 
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࿐   बिलादे अ'जम से एक सुवाल आया की "एक शख्स ने तिन तलाक़ो की क़सम इस तौर पर खाई है की वो अल्लाह की ऐसी इबादत करेगा की जिस वक़्त वो इबादत में मशगूल हो तो लोगो में से कोई शख्स भी वो इबादत न कर रहा हो।

࿐   अगर वो ऐसा न कर सका तो उसकी बीवी को 3 तलाक़ै हो जाएगी, तो इस सूरत में कौन सी इबादत करनी चाहिए ?" इस सुवाल से उल्माए इराक़ हैरान और शशदर रह गए।

࿐   और इस मसअले को उन्होंने हुज़ूर ग़ौसे आ'ज़म रहमतुल्लाह अलैह की खिदमते अक़्दस में पह किया तो आप ने फौरन इसका जवाब इर्शाद फ़रमाया की "वो शख्स मक्कए मुकर्रमा चला जाए और तवाफ़ की जगह सिर्फ अपने लिये खाली कराए और तन्हा 7 मर्तबा तवाफ़ करके अपनी क़सम को पूरा करे।"

࿐   इस शाफ़ी जवाब से उल्माए इराक़ को निहायत ही तअज्जुब हुवा क्यू की वो इस सुवाल के जवाब से आ'जिज़ हो गए थे।

              *✐°°•. बाकी अगली पोस्ट में पढ़ें!*

   *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 30-31 📚*

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    *❝ वाह क्या मर्तबा ऐ ग़ौस है बाला तेरा ❞* 
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࿐   हज़रते शैख़ अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन ख़िज़र के वालिद फरमाते है की मेने हज़रते ग़ौसे आ'ज़म रहमतुल्लाह अलैह  के मदरसे में ख़्वाब देखा की एक बड़ा वसीअ मकान है और उस में सहरा और समुन्दर के मशाइख़ मौजूद है और हज़रते शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी उनके सद्र है, उनमे बाज़ मशाइख़ तो वो है जिन के सर पर सिर्फ इमामा है और बाज़ वो है जिनके इमामे पर एक तुर्रा है और बाज़ के दो तुररे है लेकिन हुज़ूर ग़ौसे पाक के इमामा शरीफ पर तिन तुररे है।

࿐   मैं उन तिन तुररे के बारे में मुतफ़क्किर था और इसी हालत में जब में वेदार हुवा तो आप मेरे सिरहाने खड़े थे इर्शाद फ़रमाने लगे की खिजर ! एक तुर्रा इल्मे शरीअत की शराफत का और दूसरा इल्मे हक़ीक़त की शराफ़त का और तीसरा शरफ़ व मर्तबे का तुर्रा है।

              *✐°°•. बाकी अगली पोस्ट में पढ़ें!*

   *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 30-31 📚*

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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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    *❝  हुज़ूर ग़ौसे आ'ज़म की साबित क़दमि  ❞* 
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࿐   हज़रत कुत्बे रब्बानी शैख़ अब्दुल क़ादिर अल जिलानी अल हसनी वल हुसैनी रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी साबित क़दमि का खुद इस अंदाज़ में ताज़्करा फ़रमाया है की मैंने (राहे खुदा عزوجل में) बड़ी बड़ी सख्तिया और मशक़्क़्ते बतदश्त की अगर वो किसी पहाड़ पर गुज़रती तो वो भी फट जाता।

*࿐   शयातीन से मुक़ाबला :-* शैख़ उस्मान अस्सरिफैन रहमतुल्लाह अलैह फरमाते है : मैंने शहंशाहे बगदाद हुज़ूरे ग़ौसे पाक रहमतुल्लाह अलैह की ज़बाने मुबारक से सुना की में शबो रोज़ बयाबानो और वीरान जंगलो में रहा करता था।

࿐   मेरे पास शयातीन मुसल्लह हो कर हैबत नाक शक्ल में कीतार आते और मुझ से मुक़ाबला करते, मुझ पर आग फेकते मगर में अपने दिल में बहुत ज्यादा हिमत और ताक़त महसूस करता और गैब से कोई मुझे पुकार कर कहता : ऐ अब्दुल क़ादिर ! उठो उनकी तरफ बढ़ो, मुक़ाबले में हम तुम्हे साबित क़दम रखेंगे और तुम्हारी मदद करेंगे।

࿐   फिर जब में उन की तरफ बढ़ता तो वो दाए बाए या जिधर से आते उसी तरफ भाग जाते, उन मेसे मेरे पास सिर्फ एक ही शख्स आता और डराता और मुझे कहता की यहाँ से चले जाओ।

࿐   तो में उसे एक तमाचा मारता तो वो भागता नज़र आता फिर में "ला-हव्ल-वला-क़ुव्वत इल्ला-बिल्ला-हिल-अ'लिय्यिल-अ'ज़िम" पढता तो वो जल कर ख़ाक हो जाता।..✍

              *✐°°•. बाकी अगली पोस्ट में पढ़ें!*

    *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 32📚*

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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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    *❝  ज़ाहिर व बातिनी औसाफ के जामेअ  ❞* 
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࿐   मुफ्तिये इराक़ मुहयुद्दीन शैख़ अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन अली तौहीदि रहमतुल्लाह अलैह फरमाते है!

࿐   हज़रते शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह जल्द रोने वाले, निहायत ख़ौफ़ वाले, बा हैबत, मुस्तजाबुद्दा'वात, करीमुल अख़लाक़, खुशबूदार पसीने वाले, बुरी बातो से दूर रहने वाले, हक़ की तरफ लोगो से ज्यादा क़रीब होने वाले, नफ़्स पर क़ाबू पाने वाले, इन्तिक़ाम न लेने वाले, साइल को न झिड़कने वाले, इल्म से मुहज़्ज़ब होने वाले थे!

࿐   आदाबे शरीअत आप के ज़ाहिरी औसाफ़ और हक़ीक़त आप का बातिन था।..✍

              *✐°°•. बाकी अगली पोस्ट में पढ़ें!*

  *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 32-33 📚*

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       *❝  समुंदरी तरीक़त आप के हाथो में  ❞* 
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࿐    कुत्बे शहरी अहमद रिफाइ रहमतुल्लाह अलैह से मरवी है की : शैख़ अब्दुल क़ादिर रहमतुल्लाह अलैह वो है की शरीअत का समुन्दर उनके दाए हाथ है!

࿐   और हक़ीक़त का समुन्दर उनके बाए हाथ, जिस में से चाहे पानी ले,हमारे इस वक़्त में अब्दुल क़ादिर का कोई सानी नहीं।

࿐   *40 साल तक इशा के वुज़ू से नमाज़े फज्र अदा फ़रमाई :-* शैख़ अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन अबूल फ़त्ह हरवी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है की : मैंने हज़रते शैख़ मुहयुद्दीन अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह की 40 साल तक खिदमत की, इस मुद्दत में आप इशा के वुज़ू से सुबह की नमाज़ पढ़ते थे और आप का मामूल था की जब बे वुज़ू होते थे तो उसी वक़्त वुज़ू फ़रमा कर दो रकअत नमाज़े नफ़्ल पढ़ लेते थे।

࿐   *15 साल तक हर रात में ख़त्मे क़ुरआने मजीद :-* हुज़ूरे गौसुस्स-क़लैन् रहमतुल्लाह अलैह 15 साल तक रत भर में एक क़ुरआने पाक ख़त्म करते रहे और आप हर रोज़ एक हज़ार रकअत नफ़्ल अदा फ़रमाते थे।..✍

              *✐°°•. बाकी अगली पोस्ट में पढ़ें!*

    *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 33 📚*

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       *❝  आप के बयान मुबारक की बरकतें  ❞* 
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࿐    हज़रते बज़्ज़ाज़ रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है : मैंने हज़रते शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी से सुना की आप कुरसि पर बैठे फ़रमा रहे थे।

࿐   कि मैंने हुज़ूर सय्यिदे आ'लम ﷺ की ज़ियारत की तो आप ने मुझे फ़रमाया : बेटा तुम बयान क्यू नहीं करते?

࿐    मैंने अर्ज़ किया : ऐ मेरे नानाजान ! में एक अ'ज़िम कार्ड हु, बग़दाद में फूसहा के सामने बयान कैसे करू?

࿐    आप ﷺ ने मुझे फ़रमाया : बेटा अपना मुह खोलो ! मैंने अपना मुह खोला, तो आप ﷺ ने मेरे मुह में सात दफा लुआ'बे मुबारक डाला और मुझसे फ़रमाया की लोगो के सामने बयान किया करो और उन्हें अपने रब की तरफ़ उम्दा हिक्मत और नसीहत के साथ बुलाओ।

࿐    फिर मैंने नमाज़े ज़ोहर अदा की और बैठ गया, मेरे पास बहुत से लोग आए और मुज पर चिल्लाए, इसके बाद मेने हज़रते अली इब्ने अबी ताकिब की ज़ियारत की, की मेरे सामने मजलिस में खड़े है और फ़रमाते है की "ऐ बेटे तुम बयान क्यू नहीं करते?

࿐   मैंने अर्ज़ की: ऐ मेरे वालिद ! लोग मुझ पर चिल्लाते है फिर आप ने फ़रमाया : ऐ मेरे फ़रज़न्द ! अपना मुह खोलो मेने अपना मुह खोला तो आप ने मेरे मुह में 6 दफा लुआ'ब डाला।

࿐    मैंने अर्ज़ की : आप ने 7 दफा क्यू नहीं डाला ? उन्होंने फ़रमाया : रसूलुल्लाह ﷺ के अदब की वजह से। फिर वो मेरी आँखों से ओझल हो गए।..✍

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  *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 34-35 📚*

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       *❝  आप का पहला बयान मुबारक  ❞* 
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࿐   हुज़ूर गौस आ'ज़म रहमतुल्लाह अलैह का पहला बयान इज्तिमाए बरानिया में माहे शव्वालुल मुकर्रम 521 ही. में अज़ीमुश्शान मजलिस में हुवा जिस पर हैबत व रौनक़ छाई हुई थी औलियाए किराम और फिरिश्तो ने उसे ढापा हुवा था।

࿐   आप ने किताब व सुन्नत की तसरिह के साथ लोगो को अल्लाह तआला की तरफ बुलाया तो वो सब इताअत व फ़रमा बरदारी के लिये जल्दी करने लगे।

࿐   *40 साल तक इस्तिक़ामत से बयान फ़रमाया :-* ग़ौसे पाक रहमतुल्लाह अलैह के फऱज़न्दे अर्जुमन्द अब्दुल वह्हाब रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है की : हुज़ूर शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह ने 521 ही. से 561 ही. तक 40 साल मख़लूक़ को वा'ज़ो नसीहत फ़रमाई।...✍

              *✐°°•. बाकी अगली पोस्ट में पढ़ें!*

     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 35 📚*

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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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       *❝  आप के बयान मुबारक की तासीर ❞* 
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࿐   हज़रते इब्राहिम बिन साद रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है की जब हमारे शैख़ हुज़ूरे ग़ौसे आ'ज़म रहमतुल्लाह अलैह आ'लिमो वाला लिबास पहन कर उचे मक़ाम पर जल्वा अफरोज़ हो कर बयान फ़रमाते तो लोग आप के कलामे मुबारक को बागौर सुनते और उस पर अ'मल पैरा होते।

࿐  *आप की आवाज़ मुबारक की करामत :-* हज़रते शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह की मजलिसे मुबारक में बा वुज़ूद ये की सुरकाए इज्तिमा बहुत ज्यादा होते थे लेकिन आप की आवाज़ मुबारक जैसी नज़्दीक वालो को सुनाई देती थी वैसी ही दूर वालो को सुनाई देती थी यानि दूर और नज़्दीक वालो के लिये आप की आवाज़ मुबारक यक्सा थी।..✍

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  *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 35-36 📚*

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

     *❝  शुरकाए इज्तिमाअ पर आप की हैबत ❞* 
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࿐   आप शुरकाए इज्तिमा के दिलो के मुताबिक़ बयान फ़रमाते और कश्फ़ के साथ उनकी तरफ़ मुतवज्जेह हो जाते।

࿐   जब आप मिम्बर पर खड़े हो जाते तो आप के जलाल की वजह से लोग भी खड़े हो जाते थे : और जब आप उनसे फ़रमाते की चुप रहो। तो सब ऐसे ख़ामोश हो जाते की आप की हैबत की वजह से उन की सासो के इलावा कुछ भी सुनाई न देता।..✍

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  *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 35-36 📚*

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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

*❝ अम्बिया और औलिया की आप के बयान में तशरीफ़ आवरी ❞* 
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࿐   शैख़ मुहक़्क़ीक़ शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस दहेल्वी फ़रमाते है : ग़ौसे पाक रहमतुल्लाह अलैह की मजलिस शरीफ में कुल औलिया और अम्बियाए किराम जिस्मानी हयात और अरवाह के साथ नीज़ जिन्न और मलाएका तशरीफ़ फ़रमा होते थे।

࿐   और हबिबे रब्बुल आ'लमिन ﷺ भी तरबिय्यत व ताईद फ़रमाने के लिये जल्वा अफरोज़ होते थे।

࿐   और हज़रते खिजर अलैरहमा तो अक्सर अवक़ात मजलिस शरीफ के हाज़िरीन में शामिल होते थे और न सिर्फ खुद आते बल्कि मशाईखे ज़माना में से जिस से भी आप की मुलाक़ात होती तो उन को भी आप की मजलिस में हाज़िर होने की ताकीद फ़रमाते हुए इर्शाद फ़रमाते की जिस को भी फ़लाह व कामरानी की ख्वाहिश हो उस को ग़ौसे पाक रहमतुल्लाह अलैह की मजलिस शरीफ की हमेशा हाज़री ज़रूरी है।..✍

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  *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 35-36 📚*

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

    *❝ जिन्नात भी आप का बयान सुनते हैं। ❞* 
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࿐    शैख़ अबू ज़करिया यहया बिन अबी नसर् सहरावी रहमतुल्लाह अलैह के वलीद फ़रमाते है की "मेने एक दफा अ'मल के ज़रिए जिन्नात को बुलाया तो उन्हों ने कुछ ज़्यादा देर कर दी फिर वो मेरे पास आए और कहने लगे के"जब शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी बयान फरमा रहे होते उस वक़्त हमें बुलाने की कोशिश न किया करो।

࿐   मैंने कहा क्यू? उन्होंने कहा की हम हुज़ूरे ग़ौसे आ'ज़म रहमतुल्लाह अलैह की मजलिस में हाज़िर होते है।

࿐   मैंने कहा : तुम भी उनकी मजलिस में जाते हो ? उन्होंने कहा : हा हम मर्दों में कसीर तादाद में होते है, हमारे बहुत से गुरौह है जिन्हों ने इस्लाम क़बूल किया है और उन सब ने हुज़ूर ग़ौसे पाक रहमतुल्लाह अलैह के हाथ पर तौबा की है।..✍

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 37 📚* 

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

*❝ 500 यहूदियो और ईसाइयो का कबूले इस्लाम ❞* 
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࿐   हज़रते शैख़ मुहयुद्दीन अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है : मेरे हाथ पर 500 से ज्यादा यहूदियो और ईसाइयो ने इस्लाम क़बूल किया और एक लाख से ज्यादा डाकू, चोर, फुस्साक़ो फुज्जार, फ़सादी और बिदअटी लोगो ने तौबा की।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 37 📚*

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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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               *❝ डाकू ताइब हो गए ❞* 
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࿐   हुज़ूरे ग़ौसे पाक रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है " जब में इल्मे दिन हासिल करने के लिये जिलान से बग़दाद काफिले के हमराह रवाना हुवा और जब हमदान से आगे पहुचे तो 60 डाकू काफिले पर टूट पड़े और सारा काफिला लूट लिया।

࿐   लेकिन किसी ने मुझ से तअर्रुज़ न किया, एक डाकू मेरे पास आ कर पूछने लगा ऐ लड़के ! तुम्हारे पास भी कुछ है?

࿐   मैंने जवाब में कहा : हा।

࿐   डाकू ने कहा : क्या है ?

࿐   मैंने कहा : 40 दीनार।

࿐   उसने पूछा : कहा है ?

࿐   मैंने कहा : गुदड़ी के निचे।

࿐   डाकू इस रास्त गोई को मज़ाक़ तसव्वुर करता हुवा चला गया, इसके बाद दूसरा डाकू आया और उसने भी इसी तरह के सुवालात किये और मेने यही जवाबात उसको भी दिये और वो भी इसी तरह मज़ाक समझते हुए चलता बना।

࿐   जब डाकू अपने सरदार के पास जमा हुए तो उन्होंने अपने सरदार को मेरे बारे में बताया तो मुझे वहा बुला गया, वो माल की तक़्सीम करने में मसर्रूफ़ थे।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 39 📚*

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 

               *❝ डाकू ताइब हो गए ❞* 
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࿐   डाकुओ का सरदार मुझ से मुखातिब हुवा : तुम्हारे पास क्या है ?

࿐   मैंने कहा : 40 दिनार है।

࿐   डाकुओ के सरदार ने डाकुओ को हुक्म देते हुए कहा : इसकी तलाशी लो। तलाशी लेने पर जब सच्चाई का इज़हार हुवा तो उसने तअज्जुब से सुवाल किया की तुम्हे सच बोलने पर किस चीज़ ने आमादा किया?

࿐   मैंने कहा वालिदाए माजिदा की नसीहत ने।

࿐   सरदार बोला : वो नसीहत क्या है ?

࿐   मैंने कहा : मेरी वालिदए मोहतरमा ने मुझे हमेशा सच बोलने की तल्किन फ़रमाई थी और मेने उनसे वादा किया था की सच बोलूंगा।

࿐   तो डाकुओ का सरदार रो कर कहने लगा : ये बच्चा अपनी माँ से किये हुए वादे से मुन्हरीफ नहीं हुवा और मेने सारी उम्र अपने रब से किये हुए वादे के खिलाफ गुज़ार दी है। उसी वक़्त वो उन 60 डाकुओ समेत हाथ पर ताइब हुवा और काफिले का लूटा हुआ माल वापस कर दिया।

🌹 निगाहे वली में ये तासीर देखी।
🌹 बदलती हज़ारो की तक़दीर देखी।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 39 📚*

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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


*❝ निगाहे गैस आ'ज़म से चोर कुत्ब बन गया ❞* 
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࿐   ग़ौसे आ'ज़म रहमतुल्लाह अलैह मदिनए मुनव्वरह से हाज़िरी दे कर नंगे पाउ बगदाद शरीफ की तरफ आ रहे थे की रास्ते में एक चोर खड़ा किसी मुसाफिर का इंतज़ार कर रहा था की उसको लूट ले।

࿐   आप जब उसके क़रीब पहुचे तो पूछा : तुम कौन हो ? उसने जवाब दिया देहाती हु।

࿐   मगर आप के कश्फ़ के ज़रिए उसकी मासियत और बद किर्दारी को लिखा हुवा देख लिया और उस चोर के दिल में ख्याल आया : शायद ये ग़ौसे आ'ज़म रहमतुल्लाह अलैह है।

࿐   आप को उसके दिल में पैदा होने वाले ख्याल का इल्म हो गया तो आप ने फ़रमाया : में अब्दुल क़ादिर हु। तो वो चोर सुनते ही फौरन आप के मुबारक कदमो पर गिर पड़ा और उस की ज़बान पर "ऐ मेरे सरदार अब्दुल क़ादिर मेरे हाल पर रहम फरमाये" जारी हो गया आप को उस की हालत पर रहम आ गया और उसकी इस्लाह के लिये बारगाहे इलाही में मुतवज्जेह हुए तो गैब से निदा आई : ऐ ग़ौसे आ'ज़म ! इस चोर को सीधा रास्ता दिखा दो और हिदायत की तरफ रहनुमाई फ़रमाते हुए इसे कुत्ब बना दो।

࿐   चुनान्चे आप की निगाहे फैज़ रसा से वो कुत्बीय्यत के दरजे पर फाइज़् हो गया।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 39 📚*

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   ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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        *❝ ऊँगली मुबारक की करामत☝🏽 ❞* 
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࿐   एक मर्तबा रात में सरकारे बगदाद अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह के हमराह शैख़ अहमद रिफाइ और अदि बिन मुसाफिर रहमतुल्लाह अलैह हज़रते इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैह के मज़ारे पुर अन्वार की ज़ियारत के लिये तशरीफ़ ले गए।

࿐   मगर उस वक़्त अँधेरा बहुत ज्यादा था हज़रते ग़ौसे पाक रहमतुल्लाह अलैह उनके आगे आगे थे।

࿐   आप जब किसी पथ्थर, लकड़ी, दिवार या कब्र के पास से गुज़रते तो आप हाथ से इशारा फ़रमाते तो उस वक़्त आप का हाथ मुबारक चांद की तरह रोशन हो जाता था और इस तरह वो सब हज़रात आप के मुबारक हाथ की रौशनी के ज़रिए हज़रते इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैह के मज़ारे मुबारक तक पहुच गए।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 41 📚*

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   ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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        *❝ अल्लाह का आप से वादा ☝🏽 ❞* 
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࿐   हुज़ूर गौषे आ'ज़म रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है : मेरे परवर दगार ने मुझ से वादा फ़रमाया है की जो मुसलमान तुम्हारे मदरसे के दरवाजे से गुज़रेगा उसके अज़ाब में तख़फ़ीफ़ फरमाऊंगा।

࿐   मदरसे के करीब से गुज़रने वाले की बख्शिश : एक शख्स ने खिदमते अक़्दस में हाज़िर हो कर अर्ज़ की, फुला क़ब्रिस्तान में एक शख्स दफन किया गया है जिस का हाल ही में इंतिक़ाल हुवा है उसकी क़ब्र से चीखने की आवाज़ आती है जेसे अज़ाब में मुब्तला है।

࿐   हुज़ूर गैषे पाक रहमतुल्लाह अलैह ने इर्शाद फ़रमाया : क्या वो हमसे बैअत है ?

࿐   अर्ज़ की : मालुम नहीं। फ़रमाया : हमारे यहाँ के आने वालो में था ?

࿐   अर्ज़ की : मालुम नहीं। फ़रमाया : कभी हमारे घर का खाना उसने खाया है ?

࿐   अर्ज़ की : ये भी मालुम नहीं।

࿐   हुज़ूर गौषुस्स-क़लैन रहमतुल्लाह अलैह ने मुरा-क़बा फ़रमाया और ज़रा देर में सरे अक़्दस उठाया, हैबतो जलाल रुए अन्वर से ज़ाहिर था, इर्शाद फ़रमाया : फिरिश्ते हम से ये कहते है की एक बार इसने हम को देखा था और दिलमे नेक गुमान लाया था इस वजह से बख्श दिया गया।

࿐   फिर जो उसकी क़ब्र पर जा कर देखा तो फरियाद व बुका की आवाज़ आना बिलकुल बंद हो गई।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 41 📚*

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     *❝ अज़ाबे क़ब्र से निजात मिल गई ❞* 
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࿐   बगदाद शरीफ के महल्ले बाबुल के क़ब्रिस्तान में एक क़ब्र से मुर्दे के चीखने की आवाज़ सुनाई देने के मुतअल्लिक़ लोगो ने आप रहमतुल्लाह अलैह की बारगाह में अर्ज़ किया तो आप ने पूछा : क्या उस क़ब्र वाले ने मुझ से खिर्का पहना है ?

࿐   लोगो ने कहा : हुज़ूरे वाला इसका हमें इल्म नहीं है।

࿐   आप ने पूछा : उसने कभी मेरी मजलिस में हाज़री दी थी ?

࿐   लोगो ने अर्ज़ की : बन्दा नवाज़! इसका भी हमे इल्म नहीं।

࿐   इसके बाद आप ने पूछा : क्या उसने मेरे पीछे नमाज़ पढ़ी है ?

࿐   लोगो ने कहा : हम इस के मुतअल्लिक़ भी नहीं जानते।

࿐   तो आपने इर्शाद फ़रमाया : भुला हुवा शख्स ही ख़सार में पड़ता है।

࿐   इसके बाद आप ने मुराक़बा फ़रमाया और आप के चेहरए मुबारक से जलाल, हैबत और वक़ार ज़ाहिर होने लगा, आपने सरे मुबारक उठा कर फ़रमाया की फिरिश्तो ने मुझे कहा है : इस शख्स ने आप की ज़ियारत की है और आप से हुस्ने ज़न और महब्बत रखता था तो अल्लाह तआला ने आप के सबब इस पर रहम फरमा दिया है।

࿐   इसके बाद उस क़ब्र से कभी भी आवाज़ न सुनाई दी।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 41 📚*

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              *❝ मुर्गी  ज़िन्दा  कर  दी ❞* 
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࿐   एक बीबी सरकारे बग़दाद रहमतुल्लाह अलैह की खिदमत में अपना बेटा छोड़ गई की इस का दिल हुज़ूर से गिरविदा है अल्लाह عزوجل और उसके रसूल ﷺ के लिये इस की तरबिय्यत फरमाए।

࿐   आप ने उसे क़बूल फरमा कर मुजाहदे पर लगा दिया और एक रोज़ उनकी माँ आई देखा लड़का भूक और शब बेदारी से बहुत कमज़ोर और ज़र्द रंग हो गया है और उसे जव की रोटी खाते देखा

࿐   जब बारगाहे अक़्दस में हाज़िर हुई तो देखा की आप के सामने एक बर्तन में मुर्गी की हड्डिया राखी है जिसे हुज़ूर रहमतुल्लाह अलैह ने तनावुल फ़रमाया था।

࿐   अर्ज़ की : ऐ मेरे मौला ! हुज़ूर तो मुर्गी खाए और मेरा बच्चा जव की रोटी।

࿐   ये सुन कर हुज़ूरे पुरनूर रहमतुल्लाह अलैह ने अपना दस्ते अक़्दस उन हड्डियों पर रखा और फ़रमाया : जी उठ उस अल्लाह عزوجل के हुक्म से जो बोसीदा हड्डियों को ज़िन्दा फ़रमाएगा।

࿐   ये फरमान था की मुर्गी फौरन ज़िन्दा सहीह सालिम खड़ी हों कर आवाज़ करने लगी।

࿐   गौषे पाक रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया : जब तेरा बेटा इस दरजे तक पहुच जाएगा तो जो चाहे खाए।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 44 📚*

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           *❝ आप की दुआ की बरकत ❞* 
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࿐   हज़रते शैख़ सालेह अबुल मुज़फ्फर इस्माइल बिन अली हुमैरी ज़रीरानी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है : हज़रते शैख़ अली बिन हैतमि रहमतुल्लाह अलैह जब बीमार होते तो कभी कभी मेरी ज़मीन की तरफ जो की ज़रीरान में थी तशरीफ़ लाते और वहा कई दिन गुज़ारते।

࿐   एक दफा आप वही बीमार हो गए तो उन के पास मेरे गौषे समदानी रहमतुल्लाह अलैह बगदाद से तामीर दारी के लिये तशरीफ़ लाए।

࿐   दोनों मेरी ज़मीन पर जमा हुए, उस में दो खजूर के दरख़्त थे जो चार बरस से खुश्क थे और उन्हें फल नहीं लगता था।

࿐   हमने उन को काट देने का इरादा किया तो हज़रते अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह खड़े हुए और उन में से एक के निचे वुज़ू किया और दूसरे के निचे दो नफ़्ल अदा किये।

࿐   तो वो सब्ज़ हो गए और उनके पत्ते निकल आए।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 45 📚*

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           *❝ आप की दुआ की बरकत ❞* 
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࿐   आप ने उन पेड के निचे नफ़्ल अदा किये तो वो सब्ज़ हो गए और उनके पत्ते निकल आए और उसी हफ्ते में उन का फल आ गया हाला की वो खजूरो के फल का वक़्त नहीं था में ने अपनी ज़मीन से कुछ खजूरे ले कर आप की खिदमत में हाज़िर कर दी आप ने उस में से खाई और मुझ से कहा : अल्लाह عزوجل तेरी ज़मीन, तेरे दिरहम, तेरे साअ और तेरे दूध में बरकत दे।

࿐   हज़रते शैख़ इस्माइल बिन अली रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है की मेरी ज़मीन में उस साल की मिक़दार से दो से चार गुना पैदा होना शुरू हुवा।

࿐   अब मेरा ये हाल है की जब में एक दिरहम खर्च करता हु तो उस से मेरे पास दो से तिन गुना आ जाता है।

࿐   और जब में गंदुम की 100 बोरी किसी मकान में रखता हु फिर उस में से 50 बोरी खर्च कर डालता हु और बाक़ी को देखता हु तो 100 बोरी मौजूद होती है।

࿐   मेरे मवेशी इस क़दर बच्चे जनते हैंकि में उन का शुमार भूल जाता हु : और ये हाल हज़रते शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह की बरकत से अब तक बाक़ी है।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 46 📚*

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*❝ खलीफा का मालो दौलत खून में बदल गया ❞* 
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࿐   हज़रते अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन अबुल अब्बास मौसिलि रहमतुल्लाह अलैह अपने वालिद से नक़ल करते है की उन्होंने फ़रमाया : हम एक रात अपने शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह के मदरसे बग़दाद में थे उस वक़्त आप की खिदमत में बादशाह अल मुस्तन्जद बिल्लाह अबुल मुज़फ्फर युसूफ हाज़िर हुवा उसने आप को सलाम किया और नसीहत का ख़्वास्त-गार हुवा और आप की खिदमत में दस थैलियां लेकर की जो दस गुलाम उठाए हुए थे।

࿐   आप रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया : में इन की हाजत नहीं रखता। और क़ुबल करनेसे इंकार फरमा दिया उसने बड़ी आजिज़ी की, तब आप ने एक थैली अपने दाए हाथ में पकड़ी और दूसरी थैली बाए हाथ में पकड़ी और दोनों थैलियो को हाथ से दबा कर निचोड़ा की वो दोनों थैलियां खून हो कर बह गई।

࿐   आप रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया : ऐ अबुल मुज़फ्फर ! क्या तुम्हे अल्लाह का खौफ नहीं की लोगो का खून लेते हो और मेरे सामने लाते हो। वो आप की बात सुनकर हैरानी के आ'लम में बेहोश हो गया।

࿐   फिर हुज़ूरे गौषे पाक रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया : अल्लाह की क़सम ! अगर इसके हुज़ूर नबिय्ये पाक से रिश्ते का लिहाज़ न होता तो में खून को इस तरह छोड़ता की उसके मकान तक पहुचता।

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


*❝ अन्धो को बिना और मुर्दो को ज़िन्दा करना ❞* 
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࿐   हज़रते शैख़ बरगुज़ीदा अबुल हसन करशी फ़रमाते है : में और शैख़ अबुल हसन अली बिन हैती हज़रते शैख़ मुहयुद्दीन अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह की खिदमत में उनके मदरसे में मौजूद थे तो उनके पास अबू ग़ालिब फ़ज़्लूल्लाह बिन इस्माइल बगदादी अज़जी सौदागर हाज़िर हुवा वो आप से अर्ज़ करने लगा की : ऐ मेरे सरदार ! आप के जद्दे अमजद हुज़ूरे पुरनूर का फ़रमाने ज़ीशान है की "जो शख्स दा'वत में बुलाया जाए उस को दा'वत क़बूल करनी चाहिये।

࿐   मैं हाजिर हुवा हु की आप मेरे घर दावत पर तशरीफ़ लाए।

࿐   आप ने फ़रमाया : अगर मुझे इजाज़त मिली तो में आऊंगा। फिर कुछ देर बाद आपने मुराक़बा करके फ़रमाया : हा आऊंगा।

࿐   फिर आप रहमतुल्लाह अलैह अपने खच्चर पर सुवार हुए, शैख़ अली ने आप की दाई रिकाब पकड़ी और मेने बाई रिकाब थामी और जब उसके घर में हम आए देखा तो उस में बगदाद के मसाइख्, उल्मा और मुअज़्ज़ज़िन जमा है।

࿐   दस्तर ख्वान बिछाया गया जिसमे तमाम शीरी और तुर्श चीज़े खाने के लिये मौजूद थी और एक बड़ा सन्दूक़ लाया गया जो सर ब मोहर था, दो आदमी उसे उठाए हुए थे उसे दस्तर ख्वान के एक तरफ रख दिया गया।

࿐   तो अबू ग़ालिब ने कहा : इजाज़त है।

࿐   उस वक़्त हज़रते शैख़ मुहयुद्दीन अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह मुराक़बे में थे और आप ने खाना न खाया और न ही खाने की इजाज़त दी।

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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


*❝ अन्धो को बिना और मुर्दो को ज़िन्दा करना ❞* 
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࿐   आप रहमतुल्लाह अलैह ने खाने की इजाज़त न दी तो किसीने भी खाना न खाया : आप की हैबत के सबब मजलिस वालो का हाल ऐसा था की गोया उनके सरो पर परिन्दे बैठे है, फिर आप ने शैख़ अली की तरफ इशारा करते हुए फ़रमाया की वो सन्दूक़ उठा लाइए।

࿐   हम उठे और उसे उठाया तो वो वज़नी था, हमने सन्दूक़ को आप के सामने ला कर रख दिया आप ने हुक्म दिया की सन्दूक़ को खोला जाए।

࿐   हमने खोल तो उसमे अबू ग़ालिब का लड़का मौजूद था जो मादर ज़ाद अन्धा था तो आप ने उसेसे कहा : खड़ा हो जा। हमने देखा की आप के कहने की देर थी लड़का दौड़ने लगा और बिना भी हो गया और ऐसा हो गया की कभी बीमारी में मुब्तला नहीं था, ये देख कर मजलिस में शोर बरपा हो गया और आप इसी हालत में बाहर निकल आए और कुछ न खाया।

࿐   इसके बाद में शैख़ अबू साद कैल्वि की खिदमत में हाज़िर हुवा और ये हाल बयान किया तो उन्होंने कहा की हज़रते शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह मादर ज़ाद अन्धे और बरस वालो को अच्छा कर्तेभै और खुदा के हुक्म से मुर्दे ज़िन्दा करते है।

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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


    *❝ बादलो पर भी आप की हुक्मरानी ❞* 
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࿐   हज़रते शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह एक दिन मिम्बर पर बेठे ब्यान फरमा रहे थे की बारिश शुरू हो गई तो आप ने फ़रमाया : मैं तो जमा करता हु और ऐ बादल तू मुतफ़र्रिक कर देता है।

࿐   तो बदल मजलिस से हट गया और मजलिस से बाहर बरसने लगा।

࿐   रावी कहते है की अल्लाह عزوجل की क़सम ! शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह का कलाम अभी पूरा नहीं हुवा था की बारिश हम से बन्द हो गई और हम से दाए बाए बरसती थी और हम पर नहीं बरसती थी।

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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


              *❝ एक जिन्न की तौबा ❞* 
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࿐   हुज़ूर गौषे आ'ज़म रहमतुल्लाह अलैह के साहिब ज़ादे हज़रत अबू अब्दुर्रज़्ज़ाक रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है की मेरे वालीदे गिरामी शैख़ मुहयुद्दीन अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह इर्शाद फ़रमाते है की : मैं एक रात जामेए मंसूर में नमाज़ पढता था की मेने सुतूनो और किसी शै की हरकत की आवाज़ सुनी, फिर एक  बड़ा सांप आया और उसने अपना मुह मेरे सज्दे की जगह में खोल दिया।

࿐   मैंने जब सज्दे का इरादा किया तो अपने हाथ से उसको हटा दिया और सज्दा किया फिर जब में अत्तहिय्यात के लिये बैठा तो वो मेरी रान पर चलते हुए मेरी गर्दन पर चढ़ कर इससे लिपट गया, जब मेने सलाम फेरा तो उसको न देखा।

࿐   दूसरे दिन में जामेअ मस्जिद से बहार मैदान में गया तो एक शख्स को देखा जिस की आँखे बिल्ली की तरह थी और क़द लम्बा था तो मेने जान लिया की ये जीन्न है उसने मुझसे कहा : में वही जिन्न हु जिस को आप ने कल रात देखा था, मेने बहुत से औलियाए किराम को इस तरह आज़माया है जिस तरह आप को आज़माया।

࿐   मगर आप की तरह उन्मे से कोई भी साबित क़दम नहीं रहा, उन्मे बाज़ वो थे जो ज़ाहिरो बातिन से घबरा गए, बाज़ वो थे जिन के दिल में इज़्तिराब हुवा और ज़ाहिर में साबित क़दम रहे, बाज़ वो थे की ज़ाहिर में मुज़तरिब हुए और बातिन में साबित क़दम रहे, लेकिन मेने आप को देखा की आप न ज़ाहिर में घबराए और न ही बातिन में।

࿐   उसने मुझसे सुवाल किया की आप मुझे अपने हाथ पर तौबा करवाए।

࿐   मैने उसे तौबा करवाई।

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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


  *❝ शैतान लइन के सर से महफूज़ रहना ❞* 
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࿐   हज़रते शैख़ अबू नसर् मूसा शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है की मेरे वालिद ने इर्शाद फ़रमाया : मैं अपने एक सफर में सहरा की तरफ निकला और चन्द दिन वहा ठहरा मगर मुझे पानी नहीं मिलता था जब मुझे प्यास की सख्ती महसूस हुई तो एक बादल ने मुझ पर साया किया और उसमे से मुज पर बारिश के मुशाबेह एक चीज़ गिरी, में उस से सैराब हो गया।

࿐   फिर मैंने एक नूर देखा जिस से आसमान का कनारा रोशन हो ज्ञाबोर एक शक्ल जाहिर हुई जिस से मेने एक आवाज़ सुनी : ऐ अब्दुल क़ादिर ! में तेरा रब हु और मेने तुम पर हराम चीज़े हलाल कर दी है।

࿐   तो मैने अउजुबिल्लाहि-मीन-स-शैतानी-रजिम पढ़ कर कहा : ऐ शैतान लईन ! दूर हो जा।

࿐   तो रोशन कनारा अँधेरे में बदल गया और वो शक्ल धुवा बन गई फिर उसने मुझसे कहा : ऐ अब्दुल क़ादिर ! तुम मुझसे अपने इल्म, अपने रब के हुक्म और अपने मरातिब के सिलसिले में समझ बुझ के ज़रिए नजात पा गए और मेने ऐसे 70 मशाइख़् को गुमराह कर दिया।

࿐   मैंने कहा : ये सिर्फ मेरे रब का फ़ज़्लो करम है।

࿐   शैख़ अबू नसर् मूसा रहमतुल्लाह अलैहन ने आप से दरयाफ़्त किया की आप ने किस तरह जाना की वो शैतान है ?

࿐   आप ने इर्शाद फ़रमाया : उसकी इस बात से की "बेशक मेने तेरे लिये हराम चीज़ों को हलाल कर दिया।

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       *❝ गरीबो और मोहताज़ो पर रहम ❞* 
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࿐   शैख़ अब्दुल्लाह जुबाई रहमतुल्लाह अलैह बयान करते है की एक मर्तबा हुज़ूरे गैषे पाक रहमतुल्लाह अलैह ने मुझसे इर्शाद फ़रमाया : मेरे नजदीक भूखो को खाना खिलाना और हुस्ने अख़लाक़ कामिल ज्यादा फ़ज़ीलत वाले आ'माल है।

࿐   फिर इर्शाद फ़रमाया : मेरे हाथ में पैसा नहीं ठहरता, अगर सुबह को मेरे पास हज़ार दिनार आए तो शाम तक उन्मे से एक पैसा भी न बचे की गरीबो और मोहताज़ो में तक़्सीम कर दू और भूखे लोगो को खाना खिला दू।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 57 📚*

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


*❝ औलियाए किराम का आप से इज़हारे अक़ीदत ❞* 
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࿐   *मेरा क़दम हर वाली की गर्दन पर है!* हाफ़िज़ अबुल इज़्ज़ अब्दुल मुगिस बिन अबू हर्ब अल बगदादी रहमतुल्लाह अलैह से मरवी है की हम लोग बगदाद में हज़रते गौषे पाक रहमतुल्लाह अलैह की रबात हबला में हाज़िर थे उस वक़्त उन की मजलिस में इराक़ के अक्सर मशाइख़् हाजिर थे। और आप उन सब हज़रात के सामने वा'ज़ फरमा रहे थे की उसी वक़्त आप ने फ़रमाया : मेरा ये क़दम हर वलियुल्लाह की गर्दन पर है।

࿐   ये सुन कर हज़रते शैख़ अली बिन अल हैती रहमतुल्लाह अलैह का क़दम मुबारक अपनी गर्दन पर रख लिया।

࿐   इसके बाद तमाम हाज़िरीन ने आगे बढ़ कर अपनी गर्दन झुका दी।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 57 📚*

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⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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*❝ औलियाए किराम का आप से इज़हारे अक़ीदत ❞* 
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࿐   *ख्वाज़ा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह* जिस वक़्त हुज़ूर गौषे आ'ज़म रहमतुल्लाह अलैह ने बगदाद मुक़द्दस में इर्शाद फ़रमाया : मेरा ये क़दम अल्लाह के हर वली की गर्दन पर है।

࿐   तो उस वक़्त ख्वाज़ा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह अपनी जवानी के दिनों में मुल्के खुरासान के दामने कोह में इबादत करते थे।

࿐   वहा बग़दाद शरीफ में इर्शाद होता है और यहा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने अपना सर झुकाया और इतना झुकाया की सरे मुबारक ज़मीन तक पहुचा और फ़रमाया : बल्कि आप के क़दम मेरे सर पर है और मेरी आँखों पर है।

📒 सीरते गौषुस्स-क़लैन्, सफ़ह 89

࿐   मालुम हुवा की हुज़ूर गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह सुल्तानुल हिन्द हुए और यहाँ तमाम औलियाए अहदो मा बा'द आप के महकूम और हुज़ूरे गौषे पाक रहमतुल्लाह अलैह उन पर सुलतान की तरह हाकिम ठहरे।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 69 📚*

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*❝ औलियाए किराम का आप से इज़हारे अक़ीदत ❞* 
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࿐   *शैख़ अहमद रिफाइ रहमतुल्लाह अलैह* जब हज़रते शैख़ अब्दुल क़दीर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया : मेरा ये क़दम अल्लाह के हर वली की गर्दन पर है।

࿐   तो अहमद रिफाइ रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी गर्दन को झुका कर अर्ज़ किया : मेरी गर्दन पर भी आप का क़दम है।

࿐   हाज़िरीन ने अर्ज़ किया : हुज़ूरे वाला ! आप ये क्या फ़रमा रहे है ?

࿐   तो आप ने इर्शाद फ़रमाया की इस वक़्त बगदाद में हज़रते शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह ने एलान फ़रमाया है की मेरा ये क़दम अल्लाह के हर वली की गर्दन पर है और मैंने गर्दन झुका कर तामिले इर्शाद की है।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 69 📚*

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*❝ औलियाए किराम का आप से इज़हारे अक़ीदत ❞* 
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࿐  *ख्वाजा बहाउद्दीन नक़्शबन्द रहमतुल्लाह अलैह* जब आप से हुज़ूरे गौषे आ'ज़म रहमतुल्लाह अलैह के क़ौल ; "मेरा ये क़दम अल्लाह के हर वली की गर्दन पर है" के मुतअल्लिक़ दरयाफ़्त किया तो आप ने इर्शाद फ़रमाया : गर्दन तो दर कनार आप का क़दम मुबारक तो मेरी आँखों पर है।

࿐  *शैख़ माजिद अल कुर्दी रहमतुल्लाह अलैह* आप इर्शाद फ़रमाते है की जब गौषे आ'ज़म रहमतुल्लाह अलैह ने "मेरा ये क़दम अल्लाह के हर वली की गर्दन पर है" इर्शाद फ़रमाया था तो उस वक़्त कोई अल्लाह عزوجل का वली ज़मीन पर ऐसा न था की जिसने तवाज़ोअ करते हुए और आप के आ'ला मर्तबे का एतिराफ करते हुए गर्दन न झुकाई हो।

࿐  तमाम दुन्याए आ'लम के सालेह जिन्नात के वफ्द आप के दरवाज़े पर हाज़िर थे और सब के सब आप के दस्ते मुबारक पर ताइब हो कर वापस पलटे।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 70 📚*

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*❝ औलियाए किराम का आप से इज़हारे अक़ीदत ❞* 
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࿐  *सरवरे काएनात ﷺ की तस्दीक़ :* शैख़ खलीफा रहमतुल्लाह अलैह ने सरवरे काएनात ﷺ को ख्वाब में देखा और अर्ज़ किया की
हज़रते शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह ने "मेरा ये कदम अल्लाह के हर वली की गर्दन पर है" का एलान फ़रमाया है।

࿐  तो सरकारे आ'लम ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया : शैख़ अब्दुल क़ादिर रहमतुल्लाह अलैह ने सच कहा है और ये क्यू न कहते जब की वो कुत्बे ज़माना और मेरी ज़ेरे निगरानी है।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह -  71 📚*

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   *❝  ☝🏻 अल्लाह  की  इताअत  करो  ❞* 
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࿐  हज़रते शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह इर्शाद फ़रमाते है : अल्लाह की ना फ़रमानी नहीं करनी चाहिये और सच्चाई का दामन हाथ से नहीं छोड़ना चाहिये,
इस बात पर यक़ीन रखना चाहिये की तू अल्लाह का बन्दा है और अल्लाह ही की मिल्कीय्यत में है!

࿐  उसकी किसी चीज़ पर अपना हक़ ज़ाहिर नहीं करना चाहिये बल्कि उस का अदब करना चाहिये क्यू की उस के तमाम काम सहीह व दुरस्त होते है, अल्लाह के कामो को मुक़द्दम समझना चाहिये।

࿐  अल्लाह तआला हर किस्म के उमूर से बे नियाज़ है और वो ही नेमते और जन्नत अता फ़रमाने वाला है, और उसकी जन्नत की नेमतों का कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता की उसने अपने बन्दों की आँखों की ठंडक के लिये क्या कुछ छुपा रखा है!

࿐  इसलिये अपने तमाम काम अल्लाह ही की सिपुर्द करना चाहिये, अल्लाह तआला ने अपना फ़ज़्ल व नेमत तुम और पूरा करने का अहद किया है और वो इसे ज़रूर पूरा फ़रमाएगा।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह -  79 📚*

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 

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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


         *🌹 मल्फ़ूज़ाते  गौषे  आ'ज़म 🌹*

   *❝  ☝🏻 अल्लाह  की  इताअत  करो  ❞* 

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࿐  बन्दे का शजरे इमानी उसकी हिफाज़त और तहफ़्फ़ुज़ का तक़ाज़ा करता है, शजरे इमानी की परवरिश ज़रूरी है, हमेशा इस की आब-यारी करते रहो, इसे नेक आ'माल की खाद देते रहो ताकि इसके फल फुले और मेवे बर क़रार रहे!

࿐  अगर ये मेवे और फल गिर गए तो शजरे इमानी वीरान हो जाएगा और अहले सरवत के ईमान का दरख़्त हिफाज़त के बिगैर कमज़ोर है लेकिन तफक़्क़ुरे इमानी का दरख़्त परवरिश और हिफाज़त की वजह से तरह तरह की नेमतों से फ़ैज़याब है!

࿐  अल्लाह अपने एहसान से लोगो को तौफ़ीक़ अता फ़रमाता है और उन को अर-फओ आ'ला मक़ाम अता फ़रमाता है।

࿐  अल्लाह तआला की ना फ़रमानी नहीं कर, सच्चाई का दामन हाथ से नहीं छोड़ और उस के दरबार में आजिज़ी से माज़िरत करते हुए अपनी हाजत दिखाते हुए आजिज़ी का इज़हार कर!

࿐  आँखों को झुकाते हुए अल्लाह की मख़लूक़ की तरफ से तवज्जोह हटा कर अपनी ख्वाहिशात पर क़ाबू पाते हुए दुन्या व आख़िरत में अपनी इबादत का बदला न चाहते हुए और बुलंद मक़ाम की ख्वाहिशात दिल से निकाल कर रब्बुल आ'लमिन की इबादतों रियाज़त करने की कोशिश करो।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह 79-80 📚*

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


         *🌹 मल्फ़ूज़ाते  गौषे  आ'ज़म 🌹*
 *❝  एक मोमिन को केसा होना चाहिये❓ ❞* 
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࿐  हुज़ूर गौषूल आ'ज़म शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह का फ़रमाने आलिशान है : महब्बते इलाही का तक़ाज़ा है की तू अपनी निगाहो को अल्लाह عزوجل कि रहमत की तरफ लगा दे और किसी की तरफ निगाह न हो यु की अन्धो की मानिंद हो जाए!

࿐  जब तक तू गैर की तरफ देखता रहेगा अल्लाह عزوجل का फ़ज़्ल नही देख पाएगा पस तू अपने नफ़्स को मिटा कर अल्लाह عزوجل ही की तरफ मुतवज्जेह हो जा!

࿐  इस तरह तेरे दिल की आँख फज़ले अज़ीम की जानिब खुल जाएगी और तू इसकी रौशनी अपने सर की आँखों से महसूस करेगा और फिर तेरे अंदर का नूर बाहर को भी मुनव्वर कर देगा!

࿐  अताए इलाही से तू राहतों सुकून पाएगा और अगर तूने नफ़्स पर ज़ुल्म किया और मख़लूक़ की तरफ निगाह की तो फिर अल्लाह عزوجل की तरफ से तेरी निगाह बंद हो जाएगी और तूझ से फज़ले खुदा वन्दी रुक जाएगा।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 80 📚*

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⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


         *🌹 मल्फ़ूज़ाते  गौषे  आ'ज़म 🌹*
 *❝  एक मोमिन को केसा होना चाहिये❓ ❞* 
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࿐  तू दुन्या की हर चीज़ से आँखे बंद करले और किसी चीज़ की तरफ न देख जब तक तू चीज़ की तरफ मुतवज्जेह रहेगा तो अल्लाह عزوجل का फ़ज़्ल और कुर्ब की राह तुझ पर नहीं खुलेगी

࿐   तौहीद, कज़ाए नफ़्स, महविय्य्ते ज़ात के ज़रिए दूसरे रास्ते बंद कर दे तो तेरे दिल में अल्लाह तआला के फ़ज़्ल का अ'ज़िम दरवाज़ा खुल जाएगा तू उसे ज़ाहिरी आँखों से दिल, ईमान और यक़ीन के नूर से मशाहदा करेगा।

࿐  मजीद फ़रमाते है : तेरे नफ़्स और आज़ा गैरुल्लाह की अता और वादे से आराम व सुकून नहीं पाते बल्कि अल्लाह तआला के वादे से आराम व सुकून पाते है।c

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह -  81 📚*

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⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


         *🌹 मल्फ़ूज़ाते  गौषे  आ'ज़म 🌹*
 *❝ ☝🏻 अल्लाह के वली का मक़ाम ❞* 
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࿐  शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह का इरशादे मुबारक है जब बन्दा मख़लूक़, ख्वाहिशात, नफ़्स, इरादा और दुन्या व आख़िरत की आरज़ूओं से फ़ना हो जाता है तो अल्लाह عزوجل के सिवा उसका कोई मक़सूद नही होता और ये तमाम चीज़ उसके दिलसे निकल जाती है तो वो अल्लाह عزوجل तक पहुच जाता है!

࿐  अल्लाह عزوجل उसे महबूब व मक़्बूल बना लेता है उससे महब्बत करता है और मख़लूक़ के दिल में उसकी महब्बत पैदा कर देता है।

࿐  फिर बन्दा ऐसे मक़ाम और फाइज़् हो जाता है की वो सिर्फ अल्लाह عزوجل और उसके क़ुर्बे को महबूब रखता है उस वक़्त अल्लाह तआला का खुसूसी फ़ज़्ल उस पर साया फ़िगन हो जाता है। और उसको अल्लाह عزوجل नेमते अता फ़रमाता है और अल्लाह عزوجل उस पर अपनी रहमत के दरवाज़े खोल देता है।

࿐  और उस से वादा किया जाता है की रहमते इलाही عزوجل के ये दरवाज़े कभी उस पर बंद नहीं होंगे उस वक़्त वो अल्लाह عزوجل का हो कर रह जाता है!

࿐  उसके इरादे से इरादा करता है और उसके तदब्बुर से तदबीर करता है, उसकी चाहत से चाहता है, उसकी रिज़ा से राज़ी होता है, और सिर्फ अल्लाह عزوجل के हुक्म की पाबन्दी करता है!

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह 81-82 📚*

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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


         *🌹 मल्फ़ूज़ाते  गौषे  आ'ज़म 🌹*
 *❝ तरीक़त के रस्ते पर चलने का नुस्खा ❞* 
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࿐  हज़रते शैख़ मुहयुद्दीन अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह इर्शाद फ़रमाते है : अगर इंसान अपनी तबई आदत को छोड़ कर शरीअते मुतह्हरा की तरफ रुज़ूअ करे तो हक़ीक़त में येही इताअते इलाही عزوجل है, इससे तरीक़त का रास्ता आसान होता है।

࿐  अल्लाह इर्शाद फ़रमाता है :
और जो कुछ तुम्हे रसूल अता फरमाए वो लो और जिस से मना फरमाए बाज़ रहो।

📗पारह 28

࿐  क्यू की सरकारे मदीना ﷺ की इत्तिबाअ ही अल्लाह عزوجل की इताअत है, दिल में अल्लाह عزوجل की वहदानिय्यत के सिवा कुछ नहीं रहना चाहिये, इस तरह तू फनाफ़िल्लह के मक़ाम पर फाइज़् हो जाएगा और तेरे मरातिब से तमाम हिस्से तुझे अता किये जाएगे अल्लाह عزوجل तेरी हिफाज़त फ़रमाएगा, मुवाफक़्ते खुदा वन्दी عزوجل हासिल होगी।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 82 📚*

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


         *🌹 मल्फ़ूज़ाते  गौषे  आ'ज़म 🌹*
 *❝ तरीक़त के रास्ते पर चलने का नुस्खा ❞* 
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࿐  अल्लाह عزوجل तुझे गुनाहो से महफूज़ फ़रमाएगा और तुझे अपने फज़ले अ'ज़िम से इस्तिक़ामत अता फ़रमाएगा, तुझे दिन के तक़ाज़ों को कभी भी फरामोश नहीं करना चाहिये इन आ'माल को शरीअत की पैरवी करते हुए बजा लाना चाहिये!

࿐  बन्दों को हर हाल में अपने रब की रिज़ा पर राज़ी रहना चाहिये, अल्लाह عزوجل की नेमतों से शरीअत की हुदूद ही में रह कर लुत्फ़ व फाएदा उठाना चाहिये और इन दुन्यवि नेमतों से तो हुज़ूर ने भी हुदूदे शरअ में रह कर फाएदा उठाने की तरगिब् दिलाई है!

࿐  चुनान्चे सरकारे दो जहान ﷺ इर्शाद फ़रमाते है : खुशबू और औरत मुझे महबूब है और मेरी आँखों की ठन्डक नमाज़ में है।

࿐  लिहाज़ा इन नेमतों पर अल्लाह عزوجل का सुक्र अदा करना वाजिब है, अल्लाह عزوجل के अम्बियाए किराम और औलियाए इज़ाम को नेमते इलाहिय्यह हासिल होती है और वो उसको अल्लाह عزوجل की हुदूद में रह कर इस्तिमाल फ़रमाते है!

࿐  इंसान के जिस्म व रूह की हिदायत व रहनुमाई का मतलब ये है की ऐतिदाल के साथ अहकामे शरीअत की तामील होती रहे और इस में सीरते इनसानी की तकमील जारी व सारी रहती है।

🖊हवाला
📒फुतुहुल गैब मुतर्जम, सफा 72

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह 82-83 📚*

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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         *🌹 मल्फ़ूज़ाते  गौषे  आ'ज़म 🌹*
          *❝   रिज़ाए  इलाही  ❞* 
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࿐   हज़रते शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह इर्शाद फ़रमाते है : जब अल्लाह तआला अपने बन्दे की कोई दुआ क़बूल फ़रमाता है और जो चीज़ बन्दे ने अल्लाह तआला से तलब की वो उसे अता करता है!

࿐   तो इससे इरादए खुदा वन्दी में कोई फ़र्क़ नहीं आता और न नविश्तए तक़दीर ने जो लिखा दिया है उस की मुखालफत लाज़िम आती है क्यू की इस का सुवाल अपने वक़्त पर रब तआला के इरादे के मुवाफ़िक़ होता है इस लिये क़बूल हो जाता है!

࿐  और रोज़े अज़ल से जो चीज़ इसके मुक़द्दर में है वक़्त आने पर इसे मिल कर रहती है।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह 83 - 84 📚*

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


         *🌹 मल्फ़ूज़ाते  गौषे  आ'ज़म 🌹*
          *❝  रिज़ाए  इलाही  ❞* 
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࿐   अल्लाह عزوجل के महबूब ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया : अल्लाह عزوجل पर किसी का कोई हक़ वाजिब नहीं है, अल्लाह عزوجل जो चाहता करता है, जिसे चाहे अपनी रहमत से नवाज़ दे और जिसे चाहे अज़ाब में मुब्तला करदे!

࿐   अर्श से फर्श और तहतुस्सरा तक जो कुछ है वो सब का सब अल्लाह عزوجل के क़ब्ज़े में है, सारी मख़लूक़ उसी की है, हर चीज़ का ख़ालिक़ वो ही है!

࿐   अल्लाह عزوجل के सिवा कोई पैदा करने वाला नहीं है तो इन सब के बा वुज़ूद तू अल्लाह عزوجل के साथ किसी और को शरीक ठहराता है ?

࿐  अल्लाह عزوجل जिसे चाहे और जिस चाहता है ज़िल्लत में मुब्तला कर देता है, अल्लाह عزوجل की बेहतरी सब पर ग़ालिब है और वो जिसे चाहता है बे हिसाब रोज़ी अता फ़रमाता है।

🖊हवाला
📒फुतुहुल ग़ैब मुतर्ज़म, सफा 80

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह -  84 📚*

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


         *🌹 मल्फ़ूज़ाते  गौषे  आ'ज़म 🌹*
*❝  हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करो ❞* 
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࿐  हुज़ूर शैख़ मुहयुद्दीन अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह ने इर्शाद फ़रमाया परवर दगार से अपने साबिक़ा गुनाहो की बख्शीश और मौजूदा और और आइन्दा गुनाहो से बचने के सिवा और कुछ न मांग!

࿐  हुस्ने इबादत, अहकामे इलाही पर अ'मल करना, न फ़रमानी से बचने क़ज़ा व क़द्र की सख्तियो पर रिज़ा मंदी, आज़माइश में सब्र, नेमत व बख्शीश की अता और शुक्र कर, खातिमा बिलखैर और अम्बिया अलैहिमुस्सलाम, सिद्दीक़ीन, शुहदा, सालीहीन जैसे रफ़ीक़ो की रफ़ाक़त की तौफ़ीक़ तलब कर,

࿐  और अल्लाह तआला से दुन्या तलब न कर, और आज़माइश व तंगदस्ती के बजाए तवंगरि व दौलत मंदी न मांग, बल्कि तक़दीर और तदबीरें इलाही पर रिज़ा मंदी की दौलत का सुवाल कर।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह 84-85 📚*

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  ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 
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⚘ जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘ 


         *🌹 मल्फ़ूज़ाते  गौषे  आ'ज़म 🌹*
*❝ हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करो ❞* 
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࿐  जिस हाल में अल्लाह तआला ने तुझे रखा है उस पर हमेशा की हिफाज़त की दुआ कर, क्यू की तू नही जानता की इन में तेरी भलाई किस चीज़ में है, मोहताजी व फ़क़रो फ़ाक़ा में है या दौलत मंदी और तवंगरि में, आज़माइश में या आफिय्यत में है, अल्लाह तआला ने तुझ से अश्या का इल्म छुपा कर रखा है। उन अश्या की भलाइयों और बुराइयो के जानने में वो यकता है।

࿐   अमीरुल मुअमिनीन हज़रते फ़ारूक़ رضي الله تعالي عنه इर्शाद फ़रमाते है की मुझे इस बात की परवाह नहीं की में किस हाल में सुबह करूँगा आया इस हाल पर जिस को मेरी तबीअत ना पसंद करती है, या इस हाल पर की जिस को मेरी तबीअत मसंद करती है, क्यू की मुझे मालुम नहीं की मेरी भलाई और बेहतरी किस में है। ये बात अल्लाह तआला की तदबीर पर रिज़ा मंदी उसकी मसन्दीदगी और इख़्तियार और उसकी क़ज़ा पर इत्मीनान व सुकून होने के सबब फ़रमाई।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह -  85 📚*

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         *🌹 मल्फ़ूज़ाते  गौषे  आ'ज़म 🌹*
       *❝  तवक्कुल की हक़ीक़त  ❞* 
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࿐  हज़रत महबूबे सुब्हानी रहमतुल्लाह अलैह से तवक्कुल के बारे में दरयाफ़्त किया गया तो आप ने इरशाद फ़रमाया : "दिल अल्लाह की तरफ लगा रहे और उसके गैर से अलग रहे।" 

࿐   निज इरशाद फ़रमाया की तवक्कुल ये है की जिन की आँख से झांकना और मज़्हबे मारिफ़त में दिल के यक़ीन की हक़ीक़त का नाम एतिक़ाद है क्यू की वो लाज़िमी उमूर है उनमे कोई एतराज़ करने वाला नक़्स नहीं निकाल सकता।

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         *🌹 मल्फ़ूज़ाते  गौषे  आ'ज़म 🌹*
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࿐   *दुन्या को दिल से निकाल दो :* हुज़ूर गौषे आ'जम रहमतुल्लाह अलैह से दुन्या के बारे में पूछा गया तो आप ने फ़रमाया की दुन्या को अपने दिल से मुकम्मल तौर पर निकाल दे फिर वो तुझे नुक़सान नहीं पहुचाएगी।

࿐   *शुक्र क्या है ?*  शैख़ मुहयुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह से शुक्र के बारे में दरयाफ़्त किया गया तो आप ने इरशाद फरमाया की शुक्र की हक़ीक़त ये है की आजिज़ी करते हुए नेमत देने वाले की नेमत का इक़रार हो और इसी तरह आजिज़ी करते हुए अल्लाह के एहसान को माने और ये समझ ले की वो शुक्र अदा करने से आजिज़ है।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 87 📚*

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 

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         *🌹 मल्फ़ूज़ाते  गौषे  आ'ज़म 🌹*••──────•◦❈◦•──────••

࿐   सब्र की हक़ीक़त : हज़रते शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया सब्र ये है की बला व मुसीबत के वक़्त अल्लाह के साथ हुस्ने अदब रखे और उसके फैसलो के आगे सरे तस्लीम खम करदे।

࿐   *सिद्क़ क्या है ?*  हज़रते शैख़ मुहयुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया अक़वाल में सिद्क़ तो ये है की दिल की मुवफक़त क़ौल के साथ अपने वक़्त में हो।

࿐  आमाल में सिद्क़ ये है की आमाल इस तसव्वुर के साथ बजा लाए की अल्लाह इसको देख रहा है और खुद को भूल जाए।

࿐  अहवाल में सिद्क़ ये है की तबीअते इंसानी हमेशा हालते हक़ पर क़ाइम रहे अगर्चे दुश्मन का खौफ हो या दोस्त का नाहक़ मुतालबा हो।

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     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह 87-88 📚*

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 ⚘ ये दिल हैं जिगर हैं ये आँखें ये सर हैं। ⚘ 

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 जहां चाहो रखलो क़दम या गौसे आज़म ⚘


 *❝ सलातुल गौषीय्या का तरीक़ा और इस की बरकतें ❞* ••──────•◦❈◦•──────••

࿐ हज़रते शैख़ अबुल क़ासिम उमर अल बज़्ज़ार रहमतुल्लाह अलैह फरमाते है की हुज़ूर सय्यिदुना शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया की जो शख्स मुझ को मुसीबत में पुकारे तो उसकी वो मुसीबत जाती रहेगी और जिस तक़लीफ़ में मुझे पुकारे तो उस की वो तकलीफ जाती रहेगी।

࿐  फिर फ़रमाया जो शख्स दो रकअत नमाज़ पढ़े और हर रकअत में सूरए फातिहा के बाद सूरए इखलास 11 बार पढ़े फिर सलाम के बाद सरवरे कौनो मका ﷺ पर दुरुदे पाक और मुझ को याद करे और इराक़ की जानिब 11 क़दम चले और मेरा नाम ले कर अपनी हाजत तलब करे तो अल्लाह के हुक्म से उस की हाजत पूरी हो जाएगी।

࿐   *आप का विसाले मुबारक :*  हज़रत सय्यिदुना शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह ने 9 रबीउल आखिर 561 हिजरी में इंतिक़ाल फ़रमाया, विसाल के वक़्त आप की उम्र शरीफ तक़रीबन 90 साल थी।

     *📬 ग़ौसे पाक के हालात सफ़ह - 90 📚*

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*📬 अल्हम्दुलिल्लाह पोस्ट मुकम्मल हुआ 🔃*
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Wednesday, 6 October 2021

मुहर्रम में क्या जाइज़ क्या नाजाइज़


 

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         ❝ मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़  ❞
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 ࿐   प्यारे इस्लामी भाईयों! मज़हबे इस्लाम में एक अल्लाह की इबादत ज़रूरी है साथ ही साथ उसके नेक बंदों से मुहब्बत व अक़ीदत भी जरूरी है। अल्लाह के नेक अच्छे और मुक़द्दस बंदों से असली, सच्ची और हक़ीक़ी मुहब्बत तो ये है कि उनके ज़रिए अल्लाह ने जो रास्ता दिखाया है उस पर चला जाए, उनका कहना माना जाए, अपनी ज़िंदगी को उनकी ज़िंदगी की तरह बनाने की कोशिश की जाए, इसके साथ साथ इस्लाम के दायरे में रहकर उनकी याद मनाना, उनका ज़िक़्र और चर्चा करना, उनकी यादगारें क़ाइम करना भी मुहब्बत व अक़ीदत है। और अल्लाह के जितने भी नेक और बरगुज़ीदा बंदे है उन सब के सरदार उसके आखिरी रसूल हज़रत मुहम्मद सलल्ललाहु तआला अलैहि वसल्लम हैं। उनका मर्तबा इतना बड़ा है कि वो अल्लाह के रसूल होने के साथ साथ उसके महबूब भी है। 

࿐  और जिस को दीन व दुनियां में जो कुछ भी अल्लाह ने दिया, देता है, और देगा, सब उन्हीं का ज़रीया, वसीला और सदक़ा है। उनका जब विसाल हुआ, और जब दुनियां से तशरीफ़ ले गए तो उन्होंने अपने क़रीबी दो तरह के लोग छोड़े थे। एक तो उनके साथी जिन्हें सहाबी कहते हैं। उनकी तादाद हुज़ूर सलल्ललाहु तआला अलैहि वसल्लम के विसाल के वक़्त एक लाख से भी ज़्यादा थी। दूसरे हुज़ूर की आल व औलाद और आप की पाक बीवियाँ उन्हें अहले बैत कहते हैं, हुज़ूर के इन सब क़रीबी लोगों से मुहब्बत रखना मुसलमान के लिए निहायत ज़रुरी है हुज़ूर के अहले बैत हों या आप के सहाबी उन में से किसी को भी बुरा भला कहना या उनकी शान में गुस्ताख़ी और बे अदबी करना मुसलमान का काम नहीं है, ऐसा करने वाला गुमराह व बद दीन है उसका ठिकाना जहन्नम है।_

*#📕मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़?  सफ़हा 3, 4*


🤲🏻 अल्लाह हमें सुनने समझने और उस पर अमल करने की तौफीक अता फरमाये ! और निगाहो से होने वाले गुनाहो से हमे महफूज़ रखे !* 🌷आमीन*

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         ❝ मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़  ❞
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  ࿐  हुज़ूर के अहले बैत में एक बड़ी हस्ती इमाम आली मक़ाम सय्येदिना "इमाम हुसैन" भी हैं उनका मर्तबा इतना बड़ा है कि वो हुज़ूर के सहाबी भी हैं, और अहले बैत में से भी हैं, यानी आपकी प्यारी बेटी के प्यारे बेटे आप के प्यारे और चहीते नवासे हैं। रात रात भर जाग कर अल्लाह की इबादत करने वाले और क़ुरआने अज़ीम की तिलावत करने वाले मुत्तक़ी, इबादत गुज़ार, परहेज़गार, बुज़ुर्ग अल्लाह के बहुत बड़े वली हैं, साथ ही साथ मज़हबे इस्लाम के लिए राहे ख़ुदा में गला कटाने वाले शहीद भी हैं। 

࿐  मुहर्रम के महीने की 10 तारीख़ को जुमा के दिन 61 हिजरी में यानी हुज़ूर के विसाल के तक़रीबन 50 साल के बाद आपको और आपके साथियों और बहुत से घर वालों को ज़ालिमों ने ज़ुल्म करके करबला नाम के एक मैदान में 3 दिन प्यासा रख कर शहीद कर दिया। इस्लामी तारीख़ का ये एक बड़ा सानिहा और दिल हिला देने वाला हादसा है, और 10 मुहर्रम जो कि पहले ही से एक तारीख़ी और यादगार दिन था इस हादसे ने इसको और भी जिंदा व जावेद कर दिया, और उस दिन को हज़रत इमाम हुसैन के नाम से जाना जाने लगा, और गोया कि ये हुसैनी दिन हो गया, और बेशक ऐसा ही होना चाहिए। 

📕मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़?  सफ़हा 4,5

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         ❝ मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़  ❞
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 ࿐  लेकिन मजहबे इस्लाम एक सीधा सच्चा संज़ीदगी और शराफ़त वाला मज़हब है, और उसकी हदे मुकर्रर हैं, लिहाज़ा इसमें जो भी हो सब मज़हब और शरीयत के दायरे में रहकर हो तभी वो इस्लामी बुज़ुर्गों की यादगार कहलाएगी, और जब हमारा कोई भी तरीक़ा मजहब की लगाई चहार दीवारी से बाहर निकल गया, तो वो ग़ैर इस्लामी और हमारी बुज़ुर्ग शख़्सियतों के लिए बाइसे बदनामी हो गया। हम जैसा करेंगे हमे देख कर दूसरे मज़हबों के लोग यही समझेंगें कि इनके बुज़ुर्ग भी ऐसा करते होंगे, क्योकि क़ौम अपने बुजुर्गों और पेशवाओ का तआरुफ़ होती है, 

࿐   हम अगर नमाज़े, क़ुरआन की तिलावत करेंगें, जुए, शराब गाने बजाने और तमाशों से बच कर ईमानदार, शरीफ़ और भले आदमी बनकर रहेंगे, तो देखने वाले कहेंगे कि जब ये इतने अच्छे हैं तो इनके बुज़ुर्ग कितने अच्छे होंगें, और जब हम इस्लाम के ज़िम्मेदार ठेकेदार बनकर इस्लाम और इस्लामी बुजुर्गों के नाम पर ग़ैर इंसानी हरकतें नाच कूद और तमाशे करेंगें तो यक़ीनन जिन्होंने इस्लाम का मुतालअ नहीं किया है उनकी नज़र में हमारे मज़हब का गलत तआरुफ़ होगा, और फिर कोई क्यों मुसलमान बनेगा?

📕मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़?  सफ़हा 4,5

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         ❝  मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़  ❞
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  ࿐    हुसैनी दिन यानी 10 मुहर्रम के साथ भी कुछ लोगो ने यही सब किया, और इमाम हुसैन के किरदार को भूल गए, और इस दिन को खेल तमाशों, ग़ैर शरई रसूम नाच गानों, मेलों, ठेलों और तफरीहों का दिन बना डाला। और ऐसा लगने लगा कि जैसे इस्लाम भी माअज़ल्लाह दूसरे मज़हबों की तरह खेल तमाशों तफरीहों और रंग रिलियों वाला मज़हब है।_

࿐  _ख़ुद को मुसलमान कहने वालों में एक नाम निहाद इस्लामी फ़िरक़ा ऐसा भी है कि उनके यहाँ नमाज़ रोज़े वगैरह अहकामे शरअ और दीनदारी की बातों को तो कोई ख़ास अहमियत नहीं दी जाती बस मुहर्रम आने पर रोना, पीटना, चीखना, चिल्लाना, कपड़े फाड़ना, मातम व सीना कोबी करना ही उन का मज़हब है गोया कि उनके नज़दीक अल्लाह तआला ने अपने रसूल को इन्हीं कामों को करने और सिखाने को भेजा था, और इन्हीं सब बेकार बातों का नाम इस्लाम है।

मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़?  सफ़हा 5,6,*

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         ❝ मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़   ❞
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࿐  मज़हबे अहले सुन्नत वलजमाअत में से भी बहुत से अवाम कुछ राफ़ज़ियों के असरात और कुछ हिंदुस्तान के पुराने ग़ैर मुस्लिमों जिन के यहाँ धर्म के नाम पर जुए खेले जाते हैं, शराबें पी जाती हैं, जगह जगह मेले लगा कर खेल तमाशों ढोल, बाजे, वगैरह ग़ैर इस्लामी काम कराये जाते हैं, उनकी सोहबतों में रहकर उनके पास बैठने उठने, रहने सहने के नतीज़े में खेल तमाशे और वाहियात भरे मेले को ही इस्लाम समझने लगे, और बांस, कागज़ और पन्नी के मुजस्सिमे बना कर उनपर चढ़ावे चढ़ाने लगे।_

࿐  दरअसल होता ये है कि ऐसे कामों कि जिन में लोगों को ख़ूब मज़ा और दिल चस्पी आये, तफरीह और चटखारे मिले उनका रिवाज़ अगर कोई डाले तो वो बहुत जल्दी पढ़ जाती है, और क़ौम बहुत जल्दी उन्हें अपना लेती है, और जब धर्म के ठेकेदार उनमे सवाब बता देते हैं तो अवाम उन्हें और भी मज़ा लेकर करने लगते हैं कि ये ख़ूब रही, रंगरलियां भी हो गई और सवाब भी मिला, तफरीह और दिल लगी भी हो गई खेल तमाशे भी हो गए और जन्नत का काम, क़ब्र का आराम भी हो गया। 

࿐ मौलवी साहब या मियाँ हुज़ूर ने कह दिया है कि सब जाइज़ व सवाब का काम है ख़ूब करो, और हमने भी ऐसे मौलवी साहब को खूब नज़राना देकर ख़ुश कर दिया है, और उन्होंने हम को तअज़िये बनाने घुमाने, ढोल बजाने और मेले ठेले लगाने और उनमें जाने की इजाज़त दे दी है अल्लाह नाराज़ हो या उस का रसूल ऐसे मौलवियों और पीरों से हम ख़ुश और वो हमसे ख़ुश।_

मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़?  सफ़हा ,6,7*

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         ❝ मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़   ❞
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 ࿐   इस सब के वाबजूद अवाम में ऐसे लोग भी काफ़ी हैं जो गलती करते हैं और इसको गलती समझते भी हैं और इस हराम को हलाल बताने वाले मौलवियों की भी उनकी नज़र में कुछ औक़ात नहीं रहती। एक गॉव का वाकिया है कोई ताज़िये बनाने वाला कारीगर नहीं मिल रहा था या बहुत सी रक़म का मुतालबा कर रहा था वहाँ की मस्जिद के इमाम ने कहा कि किसी को बुलाने की ज़रूरत नहीं है ताज़िया मैं बना दूंगा और इस इमाम ने गांव वालों को ख़ुश करने के लिए बहुत उम्दा बढ़िया और खूबसूरत ताज़िया बना कर दिया और फिर उन्हीं ताजियेदारों ने इस इमाम को मस्जिद से निकाल दिया और ये कहकर इस का हिसाब कर दिया कि ये कैसा मौलवी है कि ताज़िया बना रहा है मौलवी तो ताज़ियेदारी से मना करते हैं, और मौलवी साहब का बक़ौल शाइर ये हाल हुआ कि:_

_*"न ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम"*_
_*"न यहाँ के रहे न वहाँ के रहे"*_

👉दरअसल बात ये है कि सच्चाई में बहुत ताक़त है हक़ हक़ ही होता है। और सर चढ़ कर बोलता है और हक़ की अहमियत उनके नज़दीक भी होती है जो ना हक़ पर हैं।

*#📕मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़?  सफ़हा 7,8,*

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         ❝ मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़   ❞
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  ࿐  बहरहाल इस में कोई शक नहीं कि एक बड़ी तादाद में हमारे सुन्नी मुसलमान अवाम भाई हज़रत इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु की मुहब्बत में गलत फहमियों के शिकार हो गए और मज़हब के नाम पर नाजाइज़ तफरीह और दिल लगी के काम करने लगे उनकी गलत फहमियों को दूर करने के लिए हमने ये मज़मून मुरत्तब किया है इस मुख्तसर मज़मून में इस्लाम व सुन्नियत के नाम पर जो कुछ होता है इस मे इस्लामी नुक़्ता ए नज़र से सुन्नी उलमा के फतवों के मुताबिक़ जाइज़ क्या है और नाजाइज़ क्या है, किस में गुनाह है और किस में सवाब। इस में बहस व मुबाहिसे और तफसील की तरह न जाकर सिर्फ जाइज़ और नाजाइज़ कामों का एक जायज़ा पेश करेंगे, और पढ़ने और सुनने वालों से गुजारिश है कि ज़िद और हठ धर्मी से काम न लें, मौत क़ब्र और आख़िरत को पेशे नज़र रखें।_

_👉मेरे अज़ीज़ इस्लामी भाइयों! हम सब को यक़ीनन मरना है, और खुदा ए तआला को मुंह दिखाना है वहां ज़िद और हठ धर्मी से काम नहीं चलेगा। भाइयों! आंखें खोलो और मरने से पहले होश में आ जाओ और पढ़ो समझो और मानों।

*#📕मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़?  सफ़हा ,8,9*

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         ❝ मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़   ❞
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                 *♻️ मुहर्रम में क्या जाइज़*

࿐  _👉हम पहले ही लिख चुके हैं कि हज़रत इमाम हुसैन हों या दूसरी अज़ीम इस्लामी शख्सियतें उनसे असली सच्ची हक़ीक़ी मुहब्बत व अक़ीदत तो ये है कि उनके रास्ते पर चला जाए, और उनका रास्ता "इस्लाम" है। पांचों वक़्त की नमाज़ की पाबंदी की जाए, रमज़ान के रोज़े रखे जाएं, माल की ज़कात निकाली जाए, बस की बात हो तो ज़िन्दगी में एक मर्तबा हज भी किया जाए, जुए, शराब, ज़िना, सूद, झूंठ, ग़ीबत फ़िल्मी गानों, तामाशों और पिक्चरों वगैरह नाजाइज़ हराम कामो से बचा जाए, और उसके साथ साथ उनकी मुहब्बत व अक़ीदत में मुन्दरज़ा ज़ैल काम किये जाएं तो कुछ हर्ज़ नहीं बल्कि बाइसे खैर व बरक़त है।   

*#📕मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़?  सफ़हा 9,

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         ❝मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़    ❞
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              *♻️ न्याज़ व फ़ातिहा.......*

࿐  _हज़रत इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु और जो लोग उनके साथ शहीद किये गए उनको सवाब पहुंचाने के लिए सदक़ा व ख़ैरात किया जाए, ग़रीबों, मिस्कीनों को या दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों वगैरह को शर्बत या खिचडे या मलीदे वगैरह कोई भी खाने पीने की चीज़ खिलाई या पिलाई जाए, और उसके साथ आयाते कुरआनिया की तिलावत कर दी जाए तो और भी बेहतर है इस सब को उर्फ़ में नियाज़ फ़ातिहा कहते हैं, ये सब बिला शक जाइज़ और सवाब का काम है, और बुजुर्गों से इज़हारे अक़ीदत व मुहब्बत और उन्हें याद रखने का अच्छा तरीक़ा है लेकिन इस बारे में चंद बातों पर ध्यान रखना ज़रूरी है।_
 
࿐ न्याज़ व फ़ातिहा किसी भी हलाल और जाइज़ खाने पीने की चीज़ पर हो सकती है उसके लिए शर्बत, खिचड़े और मलीदे को ज़रूरी ख़्याल करना जिहालत है अलबत्ता इन चीजों पर फ़ातिहा दिलाने में कोई हर्ज़ नहीं है अगर कोई इन मज़कूरा चीज़ों पर फ़ातिहा दिलाता है तो वो कुछ बुरा नहीं करता, हां जो उन्हें ज़रूरी ख्याल करता है उनके एलावा किसी और खाने पीने की चीज़ पर मुहर्रम में फ़ातिहा सही नहीं मानता वो ज़रूर जाहिल है।  

*#📕मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़?  सफ़हा 9,10,*

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         ❝  मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़  ❞
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              *♻️ न्याज़ व फ़ातिहा.......*

࿐  नियाज़ फ़ातिहा में शेख़ी ख़ोरी नहीं होना चाहिए और न खाने पीने की चीज़ों मे एक दूसरे से मुक़ाबला। बल्कि जो कुछ भी हो और जितना भी हो सब सिर्फ़ अल्लाह वालों के ज़रिए अल्लाह तआला की नज़दीकी और उसका कुर्ब और रज़ा हासिल करने के लिए हो, और अल्लाह के नेक बंदों से मुहब्बत इस लिए की जाती है कि उनसे  मुहब्बत करने और उनके नाम पर खाने खिलाने और उनकी रूहों को अच्छे कामों का सवाब पहुँचाने से अल्लाह राज़ी हो, और अल्लाह को राजी करना ही हर मुसलमान की जिंदगी का असली मक़सद है।

_➡ ️नियाज़ फ़ातिहा बुज़ुर्गों की हो या बडे बूढो की उस के तौर तऱीके जो मुसलमानो में राइज़ हैं जाइज़ और अच्छे काम हैं फ़र्ज़ और वाज़िब यानी शरअन लाज़िम व ज़रूरी नहीं अगर कोई करता है तो अच्छा करता है और नहीं करता है तब भी गुनेहगार नहीं, हां कभी भी बिल्कुल न करना महरूमी है। नियाज़ व फ़ातिहा को न करने वाला गुनेहगार नहीं है, हां इससे रोकने और मना करने वाला जरूर गुमराह व बद मज़हब है और बुजुर्गों के नाम से जलने वाला है।

*#📕मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़?  सफ़हा ,10,11*

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         ❝ मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़   ❞
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              *♻️ न्याज़ व फ़ातिहा....... *

 ࿐  नियाज़ व फ़ातिहा के लिए बाल बच्चों को तंग करने की या किसी को परेशान करने की या ख़ुद परेशान होने की या उन कामों के लिए कर्ज़ा लेने की या ग़रीबों, मज़दूरों से चंदा करने की कोई ज़रूरत नहीं, जैसा और जितना मौक़ा हो उतना करें और कुछ भी न हो तो ख़ाली क़ुरआन या कलमा ए तय्यब या दुरुद शऱीफ वगैरह का ज़िक्र करके या नाफ़िल नमाज़ या रोज़े रखकर सवाब पहुंचा दिया जाए तो ये भी काफी है, और मुकम्मल नियाज़ और पूरी फ़ातिहा है, जिस में कोई कमी यानी शरअन ख़ामी नहीं है। 

ख़ुदा ए तआला ने इस्लाम के ज़रिए बंदों पर उनकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डाला। ज़कात हो या सदक़ा ए फित्र और क़ुर्बानी सिर्फ उन्हीं पर फ़र्ज़ व वाज़िब हैं जो साहिबे निसाब यानी शरअन मालदार हों। हज भी उसी पर फ़र्ज़ किया गया जिस के बस की बात हो, अक़ीक़ा व वलीमा उन्हीं के लिए सुन्नत है जिनका मौक़ा हो जब कि ये काम फ़र्ज़ व वाज़िब या सुन्नत हैं, और नियाज़ व फ़ातिहा उर्स वगैरह तो सिर्फ बिदआते हसना यानी सिर्फ अच्छे और मुस्तहब काम हैं, फ़र्ज़ व वाज़िब नहीं हैं यानी शरअन लाज़िम व जरूरी नहीं हैं। फिर नियाज़ व फ़ातिहा के लिए क़र्ज़ लेने, परेशान होने और बाल बच्चों को तंग करने की क्या जरूरत है बल्कि हलाल कमाई से अपने बच्चों की परवरिश करना बजाते ख़ुद एक बड़ा कारे ख़ैर सवाब का काम है।

*#📕मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़?  सफ़हा 11,12*

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         ❝  मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़  ❞
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  _*🍱 न्याज़ व फ़ातिहा.......*_

࿐   _खुलासा ये है कि उर्स, नियाज़ व फ़ातिहा वगैरह बुज़ुर्गों की यादगारें मनाने की जो लोग मुख़ालिफत करते हैं वो गलती पर हैं और जो लोग सिर्फ उन कामों को ही इस्लाम समझे हुए हैं और शरअन उन्हें लाज़िम व जरूरी ख्याल समझते हैं वो भी बड़ी भूल में हैं।_

_➡️ नियाज़ व फ़ातिहा की हो या कोई और खाने पीने की चीज़ उसको लुटाना, भीड़ में फेंकना कि उनकी बे अदबी हो पैरों के नीचे आये या नाली वगैरह गंदी जगहों पर गिरें एक गलत तरीक़ा है, जिससे बचना जरूरी है जैसा कि मुहर्रम के दिनों में कुछ लोग पूड़ी, गुलगुले, बिस्किट वगैरह छतों से फेंकते और लुटाते हैं ये ना मुनासिब हरकतें हैं।

*#📕मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़?  सफ़हा 12 *

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              *♻️ न्याज़ व फ़ातिहा....... *

 ࿐   नियाज़ व फ़ातिहा यानी बुजर्गों को उनके विसाल के बाद या आम मुरदों की रूहों को उनके मरने के बाद सवाब पहुचांने का मतलब सिर्फ यही नहीं कि खाना पीना सामने रखकर और क़ुरआन करीम पढ़कर ईसाले सवाब कर दिया जाए, बल्कि दूसरे दीनी इस्लामी या रिफाहे आम यानी अवाम मुसलिमीन को नफा पहुंचाने बाले काम कर के उनका सवाब भी पहुँचाया जा सकता है।_
_★किसी ग़रीब बीमार का ईलाज करा देना_
_★किसी बाल बच्चेदार बेघर मुसलमान का घर बनबा देना।_
_★ किसी बे क़सूर क़ैदी की मदद करके जेल से रिहाई दिलाना_ 
_★ जहां मस्जिद की ज़रूरत हो वहाँ मस्जिद बनवा देना_
_★ अपनी तरफ से इमाम व मुअज़्ज़िन की तनख्वाह जारी कर देना_ 
_★ मस्जिद में नमाज़ियों की ज़रूरत में ख़र्च करना_ 
_★ इल्मे दींन हासिल करने वालों या इल्म फैलाने वालों की मदद करना_ 
_★ दीनी किताबें छपवा कर या ख़रीदकर तकसीम कराना_
_★ दीनी मदरसे चलना_
_★ रास्ते और सड़के बनवाना या उन्हें सही कराना_
_★ रास्तों में राहगीरों की जरूरतो के काम कराना वगैरह वगैरह।_

_👉ये सब ऐसे काम हैं कि उन्हें करके या उनपर ख़र्चा करके, बुज़ुर्गों या बड़े बूढ़ों के लिए ईसाले सवाब की नियत कर ली जाए तो ये भी एक किस्म की बेहतरीन नियाज़ व फ़ातिहा है, ज़िन्दों और मुरदों सभी का उसमे नफा और फायदा है।

*#📕मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़?  सफ़हा 12,13,*

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              *♻️ न्याज़ व फ़ातिहा....... *

  ࿐  हदीस पाक में है कि हुज़ूर पाक के एक सहाबी हज़रते साअद इब्ने उबादा रदिअल्लाहु तआला अन्हु की माँ का विसाल हुआ तो वो बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया :- या रसूलल्लाह! मेरी माँ का इंतेक़ाल हो गया है तो कौनसा सदक़ा बेहतर रहेगा। सरकार ने फरमाया: पानी बेहतर रहेगा। उन्होंने एक कुआँ खुदवा दिया और उसके करीब खड़े होकर कहा :- ये कुआँ मेरी माँ के लिए है, (मिश्कात बाबो फ़ज़लुस्सदक़ा स. 169) यानी जो इस से पानी पिये उसका सवाब मेरी माँ को पहुँचता रहे।_


࿐ _शारेहीने हदीस फरमाते हैं:- हुज़ूर ने पानी इसलिए फरमाया कि मदीना तय्यबा में पानी की किल्लत थी पीने का पानी खरीदना पड़ता था, गरीबों के लिए दिक्कत का सामना था इसलिए हुज़ूर ने सअद से कुआँ खोदने के लिए फरमाया।_

_👉इस हदीस से ये बात साफ हो जाती है कि मुरदों को कारेखैर का सवाब पहुँचता है और ये कि जिस चीज़ का सवाब पहुंचाना हो उस खाने पीने की चीज़ को सामने रखकर ये कहने में कोई हर्ज़ नहीं कि उसका सवाब फलां को पहुंचे, क्योकि हज़रत सअद ने कुआँ खुदवा कर कुआँ की तरफ इशारा करके ये ये अल्फ़ाज़ कहे थे, लेकिन इससे ज़रूरी भी नहीं समझना चाहिए कि खाना पानी सामने रखकर ही ईसाले सवाब जाइज़ है, दूर से भी कह सकते हैं, दिल में कोई नेक काम करके या कुछ पढ़कर या खिलाकर किसी को सवाब पहुंचाने की नियत करलें तब भी काफ़ी है। अल्लाह तआला सवाब देने वाला है वो दिलों के अहवाल से ख़ूब वाकिफ़ है। ये सब तऱीके दुरुस्त हैं उन में से जो किसी तऱीके को गलत कहे वही ख़ुद गलत है।


*#📕मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़?  सफ़हा 13,14*

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࿐  *📋 ज़िक्रे शहादत*

_हज़रत सय्यद इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु और दूसरे हज़रात अहले बैअत किराम का ज़िक्र नज़्म में या नस्र में करना और सुनना यक़ीनन जाइज़ है, और बाइसे ख़ैर व बरकत व नुज़ूले रहमत है लेकिन इस सिलसिले में नीचे लिखी हुई बातों को ध्यान में रखना ज़रूरी है।_

࿐  _ज़िक्रे शहादत में सही रिवायात और सच्चे वाकियात बयान किये जाए, आज कल कुछ पेशेवर मुक़र्रीरों और शायरों ने अवाम को ख़ुश करने और तक़रीरों को जमाने के लिए अज़ीब अज़ीब किस्से और अनोखी निराली हिकायात और  गढ़ी हुई कहानियां और करामात बयान करना शुरू कर दिया है, क्योकि अवाम को ऐसी बातें सुनने में मज़ा आता है, और आज कल के अक्सर मुक़र्रीरों को अल्लाह व रसूल से ज़्यादा अवाम को खुश करने की फ़िक्र रहती है, और बज़ाहिर सच से झूंठ में मज़ा ज्यादा है और जलसे ज़्यादातर अब मज़ेदारियों के लिए ही हो रहे हैं।_
_आला हज़रत मौलाना शाह अहमद रज़ा रहमतुल्लाहि तआला अलैहि फरमाते हैं:-_
 
࿐  _शहादत नामे नज़्म या नस्र जो आज कल अवाम में राइज़ है अक्सर रिवायाते बातिला व बे सरोपा से ममलू और अकाज़ीब मोज़ूआ पर मुश्तमिल है, ऐसे बयान का पढ़ना और सुन्ना, वो शहादत नामा हो, ख्वाह कुछ और मजलिसे मीलाद मुबारक में हों ख्वाह कहीं और मुतलकन हराम व नाजाइज़ है।_  

📕 *(फतावा रजविया जि. 24, स.514, मतबूआ रज़ा फाउंडेशन लाहौर)*

*📚(मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०- 15,

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  *📋 ज़िक्रे शहादत*

 ࿐   _और उसी किताब के सफ़हा 522 पर इतना और है:-_ 
_यूँही मरसिये। ऐसी चीज़ों का पढ़ना सुन्ना सब गुनाह व हराम है।_
_हदीस पाक में है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मरसियों से मना फरमाया।_ (ज़िक्रे शहादत का मक़सद सिर्फ वाकियात को सुन कर इबरत व नसीहत हासिल करना हो और साथ ही साथ स्वालिहीन के ज़िक़्र की बरकत हासिल करना ही हो, रोने और रुलाने के लिए वाकियाते कर्बला_ _बयान करना नाजाइज़ व गुनाह है।इस्लाम में 3 दिन से ज्यादा मौत का सोग जाइज़ नहीं)_

࿐  _आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान बरेलवी फरमाते हैं:-_
_शरीयत में औरतों को शौहर की मौत पर चार महीने दस दिन सोग मनाने का हुक्म दिया है, औरों की मौत के तीसरे दिन तक इजाज़त दी है, बाक़ी हराम है, और हर साल सोग की तजदीद तो असलन किसी के लिए हलाल नहीं।_

 *📕(फतावा रजविया जि.24, स.495)*

*📚(मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०- 16,

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         ❝ मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़   ❞
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  *📋 ज़िक्रे शहादत*

  ࿐  _और रोना रुलाना सब राफ़ज़ीयों के तौर तरीके हैं क्योकि उनकी किस्मत में ही ये लिखा हुआ है।_ _राफ़ज़ी ग़म मनाते हैं और ख़ारजी ख़ुशी मनाते हैं और सुन्नी, वाकियाते कर्बला से नसीहत व इबरत व इबरत हासिल करते है और दीन की खातिर कुर्बानियां देने और मुसीबतों पर सब्र करने का सबक लेते हैं और उनके ज़िक़्र से बरकत और फ़ैज़ पाते हैं।_

࿐  _हाँ अगर उनकी मुसीबतों को याद करके ग़म हो जाए या आँसू निकल आये तो ये मुहब्बत की पहचान है।_ _मतलब ये है कि एक होता है ग़म मनाना और ग़म करना, और एक होता है ग़म हो जाना। ग़म मनाना और करना नाजाइज़ है और ध्यान आने पर ख़ुद बख़ुद हो जाए तो जाइज़ है।_

*📚(मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०- 17)*


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*📋 मुहर्रम में क्या नाजाइज़ ?.......*

                     (तअज़ियेदारी)

࿐  _आज कल जो ताज़िये बनाये जाते हैं, पहली बात ये हज़रत इमाम आली मक़ाम के रोज़ा का सही नक़्शा नहीं है, अज़ीब अज़ीब तरह के ताज़िये बनाये जाते हैं, फिर उन्हें घुमाया और गश्त कराया जाता है, एक दूसरे से मक़ाबिला किया जाता है, और उस मुक़ाबिले में कभी कभी लड़ाई झगड़े और लाठी डंडे चाकू और छुरी चलाने की नौबत आ जाती है, और ये सब हज़रत इमाम हुसैन की मुहब्बत के नाम पर किया जाता है। अफ़सोस इस मुसलमान को क्या हो गया है और ये कहाँ से चला था और कहां पहुँच गया, कोई समझाये तो मानने को तय्यार नहीं, बल्कि उल्टा समझाने वाले को बुरा भला कहने लगता है।_

࿐  _खुलासा ये है कि आज की ताज़िये और इसके साथ होने वाली तमाम बिदआत व खुराफ़ात व वाहियात सब नाजाइज़ व गुनाह है, मसलन मातम करना, ताज़िये पर चढ़ावे चढ़ाना उनके सामने खाना रखकर वहाँ फ़ातिहा पढ़ना, उनसे मन्नत मांगना, उनके नीचे से बरकत हासिल करने के लिए बच्चों को निकालना, ताज़िये देखन कोे जाना, उन्हें झुककर सलाम करना, सवारियाँ निकलना, सब जाहिलाना बातें और नाजाइज़ हरकतें हैं, उनका मजहबे इस्लाम से कोई वास्ता नहीं, और जो जानता है उसका दिल ख़ुद कहेगा कि इस्लाम जैसा सीधा और शराफत व संजीदगी वाला मज़हब उन तमाशों और वहम परस्ती की बातों को कैसे गवारा कर सकता है?_ ࿐

*📚 (मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०- 17,18*

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         ❝ मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़   ❞
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*📋 मुहर्रम में क्या नाजाइज़ ?.......*

                     (तअज़ियेदारी)


  ࿐  _कुछ लोग कहते हैं कि ताज़िये और उसके साथ साथ ढोल बाजे और मातम करते हुए घूमने से इस्लाम और मुसलमानों की शान ज़ाहिर होती है।_

 _ये एक फ़ुज़ूल बात है, पांचों वक़्त की अज़ान और मुहल्ले बस्ती और शहर के सब मुसलमानों का मस्जिदों और ईदगाहों में जुमा और ईद की नमाज़ बा जमाअत अदा करने से ज़्यादा मुसलमानों की शान ज़ाहिर करने वाली कोई और चीज़ नहीं। ताज़िये और उसके तमाशों, ढोल बाजों और कूदने फांदने, मातम करने और बुज़ुर्गों के नाम पर ग़ैर शरई उर्सों, मेलों और आज की क़व्वालियों की महफिलों को देखकर तो गैर मुस्लिम ये समझते हैं कि इस्लाम भी हमारे मज़हब कु तरह तमाशाई मज़हब है, बजाये सुधरने और इस्लाम की तरफ आने के और चिढ़ते हैं, और कभी कभी उस ताज़िये की वजह से लड़ाई झगड़े और ख़ूनरेज़ी की नौबत आती है, और बे वजह मुसलमानों का नुकसान होता है, और नमाज़, रोज़ा, ईमानदारी और सच्चाई, अहकामे शरअ की पाबंदी और दीनदारी को देखकर ग़ैर मुस्लिम भी कहते हैं कि वाक़ई मज़हब है तो बस इस्लाम है ये और बात है कि वो किसी वजह से मुसलमान न बने, लेकिन इस में भी कोई शक़ नहीं कि बहुत से ग़ैर मुस्लिमों क़ा दिल मुसलमान होने को चाहता है और कुछ हो भी जाते है, और होते रहे हैं।

*📚 (मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०- 18,19,)*

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*📋 मुहर्रम में क्या नाजाइज़ ?.......*

                     (तअज़ियेदारी)

࿐  देखते नहीं हो कि दुनियां में कितने मुसलमान हैं और सिर्फ 1400 साल में उनकी तादाद कहाँ से कहाँ पहुँच गई, ये सब नमाज़, रोज़े और इस्लाम की भोली, सीधी, सच्ची बातों को देख कर हुए हैं, ताज़िये और उसके साथ मेलों ठेलों और तमाशों को देखकर न कोई मुसलमान हुआ, और न अब होता है। और ताज़िये से इस्लाम की शान ज़ाहिर नहीं होती बल्कि मजहबे इस्लाम की बदनामी होती है।_

࿐  _कुछ लोग मुहर्रम के दिनों में बजने वाले बाजों को ग़म का बाजा बताते हैं उन्हें मालूम होना चाहिए कि गम के मौके पर बाजे नहीं बजाए जाते और ग़म मनाना भी तो इस्लाम में जाइज़ नहीं है। ये इमाम हुसैन की दर्दनाक शहादत के नाम पर बाजे बजाने वालों से मैं पूछता हूँ कि जब उनके यहाँ कोई हादसा हो जाए या कोई मरजाये तो क्यों बाजे नहीं बजाते और बेंड मास्टर को क्यों नहीं बुलाते, नाच कूद और तमाशे क्यों नहीं करते, और जो मौलवी साहब मुहर्रम में बाजे बजाने को जाइज़ कहते हैं जब ये मरें या उनके घर में कोई मरे तो उनकी मौत पर और फिर तीजे, दसवें, चालीसवें और बरसी पर महंगा वाला बैंड लाया जाए जो मौलवी साहब के शायाने शान हो। और चूंकि उनके यहाँ ये सब सवाब का काम है लिहाज़ा उनकी रूह को इसका सवाब भी जरूर पहुँचाया जाए।

*📚 (मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०- 19,20)*

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*📋 मुहर्रम में क्या नाजाइज़ ?.......*

                     (तअज़ियेदारी)

 ࿐  बाज़ लोग कहते हैं कि हमारे ख़ानदान में ताज़िऐ पहले से होती चली आ रही है, एक साल हमने ताजियेदारी नहीं बनाया तो हमारा फलां नुकसान हो गया या बीमार हो गए या घर में कोई मर गया, ये भी जाहिलाना बातें हैं पहले तो ऐसा होता नही और हो भी जाए तो ये एक शैतानी चाल है वो चाहता है कि तुम हराम कारियों में लगे रहो, और ख़ुदा और रसूल से दूर रहो, हो सकता है कि शैतान आप को डिगाने के लिए कुछ कुछ कर देता हो, क्योकि कुछ ताक़त अल्लाह ने उसको भी दी है, और अल्लाह की ज़ात तो ग़नी है सब से बे परवाह है अगर सब सुधर जाएं नेक और परहेज़गार हो जाए तो उसे कुछ नफा और फ़ायदा नहीं पहुंचता और सब बिगड़ जाए तो उसका कुछ घाटा नहीं होता, 

࿐  इंसान अच्छा करता है तो अपने अच्छे के लिए और बुरा करता है तो अपने बुरे के लिए और मुसलमान का अक़ीदा व ईमान इतना मजबूत होना चाहिए कि दुनियां का नफ़अ हो या नुकसान हम तो वही करेंगे जिस से अल्लाह व रसूल राज़ी हो, और घाटे नफ़अ को भी अल्लाह ही जानता है हम कुछ नहीं जानते, कभी किसी चीज़ में हम फ़ायदा समझते हैं और घाटा हो जाता है और कभी घाटा और नुकसान ख़्याल करते है मगर नफ़अ और फ़ायदा निकलता है। एक शख़्स को मुद्दत से एक गाड़ी खरीदने की तमन्ना थी और जब ख़रीदी तो पूरी फैमली के साथ इस गाड़ी में एक्सीडेंट के ज़रिए मारा गया। खुलासा ये है कि अपने सब काम अल्लाह की मर्ज़ी पर छोड़ दीजिये, और उसके बताये हुए रास्ते पर चलना ज़िन्दगी का मक़सद बना लीजिए फिर जो होगा देखा जाएगा। और वही होगा जो अल्लाह चाहेगा।

*📚(मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०-20,*

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*📋 मुहर्रम में क्या नाजाइज़ ?.......*

                     (तअज़ियेदारी)

 ࿐  कुछ लोग कहते हैं कि ताज़िया और तख़्त बनाना सजाना ऐसा ही है जैसे जलसे, जुलूस, और मीलाद की महफिलों के लिए शामयाने पिंडालों, सड़कों, गलियों और घरों को सजाया जाता है। तो ये भी एक गलतफ़हमी है, जलसा, जुलूस, और महफिलों में सजाबट और डेकोरेशन असल मक़सद नहीं होता, ज़िक्रे ख़ैर वअज़ व तब्लीग और तक़रीर मक़सूद होता है उसके लिए ये सजाबटें होती हैं, और ताज़िया बनाने का मक़सद सिवाए, सवारने और घुमाने के और क्या है? और जलसे, जुलूस, और महफिलों के लिए भी हद से ज्यादा बे ज़रूरत इतना डेकोरेशन और सजाबट करना कि आने वालों का ध्यान उसी में लग कर रह जाए और वही मक़सद बनकर रह जाए और ज़िक़्र ख़ैर वअज़ व तब्लीग की तरफ से तवज्जो हट जाए ये सब करना भी अच्छा नहीं है, और उन सब सजावटों में भी आपस में मुक़ाबिले और फ़ख्र व मुबाहत ख़िलाफ़े शरअ बातें हैं। ख़ासकर गरीबों मज़दूरों से जबर्दस्ती चंदे लेकर ये सब काम ज़्यादती है, बजाए सवाब के गुनाह भी हो सकता है, क्योकि गरीबों को सताना इस्लाम में ज़्यादा बुरा काम है।_

_महफ़िलें, मजलिसे कभी कभी बग़ैर सजबट और डेकोरेशन के भी होती हैं और ताज़िया तो सजावट ही का नाम है ये ना हो तो फिर ताज़िया ही कहाँ रहा?_

*📚(मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०-20,21,

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*📋 मुहर्रम में क्या नाजाइज़ ?.......*

                     (तअज़ियेदारी)

࿐  कुछ लोग कहते हैं कि ताजियेदारी खत्म हो गई तो इमाम हुसैन का नाम मिट जाएगा तो ये भी उन लोगो की गलतफ़हमी हैं, हज़रत इमाम हुसैन का नाम तो दुनियां की लाखों मस्जिदों में हर जुमा की नमाज़ से पहले ख़ुत्बे में पढ़ा जाता है। पीरी मुरीदी के अक्सर सिलसिले उनसे होकर रसूले ख़ुदा तक पहुंचते हैं, और जब शजरे पढ़े जाते हैं तो इमाम हुसैन का नाम आता है, क़ुरआन करीम के 22वें पारे के पहले रूकूअ में जो आयते ततहीर है उसमें भी अहले बैत का ज़िक्र मौजूद है और तो और ख़ुद नमाज़ जो अल्लाह की इबादत है उसमें भी आले मुहम्मद पर दुरूद पढ़ा जाता है सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम।_ _उसके अलावा कितने जलसों, जुलूसों महफिलों, मजलिसों, नारों, नज़्मों, में उनका नाम आता है, ये सब दुनिया जानती है मेरे बताने की ज़रूरत नहीं और सही बात ये है कि इमाम हुसैन का नाम तो हर मुसलमान के दिल में अल्लाह तआला ने लिख दिया है, और जिस के दिल में इमाम हुसैन का नाम नहीं वो मुसलमान कहलाने का हक़दार नहीं। तो भाइयों! जिस का ज़िक्र नमाज़ों में, ख़ुत्बों में, क़ुरआन की आयतों में, और हज़ारों महफिलों मजलिसों और खानकाही शजरों में हो उसका नाम कैसे मिट जाएगा। ताजियादारी और उसके साथ जो तमाशे होते हैं उससे तो हज़रत इमाम पाक का नाम बदनाम किया जाता है।

*📚(मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०-22,)*

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*📋 मुहर्रम में क्या नाजाइज़ ?.......*

                     (तअज़ियेदारी)

 ࿐ जो लोग कहते हैं कि ताजियेदारी खत्म हो गई तो इमाम हुसैन का नाम मिट जाएगा मैं उनसे पूछता हूं कि हज़रत इमाम पाक से पहले और बाद में जो हज़ारों लाखों हज़रात अम्बिया व औलिया व शोहदा हुए हैं उनमें से किस किस के नाम ताजियेदारी या मेले तमाशे होते हैं? क्या उन सबके नाम मिट गए? हक़ ये है कि ताजियेदारी ख़त्म होने से इमाम हुसैन का नाम नहीं मिटेगा बल्कि_ _ताजियेदारों का नाम मिट जाएगा और आजकल ताजियेदारी अपने नाम के लिए ही हो रही है इमाम हुसैन के नाम के लिए नहीं। देखा नहीं ये ताजियेदार अपनी नामवरी कि मेरा ताज़िया सब से ऊंचा, सबसे अच्छा रहे और आगे चले उसके लिए कैसे झगड़े करते हैं, खुद भी लड़ते मरते हैं और औरों को भी मरवाते हैं_

*📚(मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०23)*

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*📋 ताज़ियेदारी लड़ाई झगड़े की बुनियाद.......1*

࿐  _लड़ाई झगड़े करना तो अक्सर जगह तअज़िये दारों की आदत बन गई है,रास्तों के लिए खड़ी फसलों को रोन्दना,अपनी वाह वाही और शान शैली के लिए एक दूसरे से मुकाबिले करना,खुब ऊँचे ऊँचे ताअज़िये बनाकर उन्हें निकालने के लिए बिज़ली के तार या खड़े दरख्तों को काटना तरह तरह से ख़ुदा की मखलूक को सताना उनका मिज़ाज हो गया है। इन सब बातों में कभी कभी गैर मुस्लिमों से भी टकराव की नौबत आ जाती है,और यह सब बे मक़सद झगड़े होते हैं। मुसलमानों की तारीख में कभी भी इन गैर ज़रूरी फालतू बातों के लिए लड़ाइयाँ नहीं लड़ी गयीं और मुसलमान फितरतन झगड़ालू नहीं होता।_ 

 ࿐ _तअज़िये दारों को तो मैंने देखा कि यह लोग तअज़िये उठा कर मातम करते हुये ढोल बाजों के साथ चलते हैं तो होश खो बैठते हैं बे काबू और आपे से बाहर हो जाते हैं जोश ही जोश दिखाई देता है। ख़ुदा न करे मैं हर मुसलमाने मर्द व औरत की जान माल,इज्ज़त व आबरू की सलामती की अल्लाह तआला से दुआ करता हूँ लेकिन इस बढ़ती हुई तअज़िये दारी और तअज़िये उठाते वक़्त ताज़ियेदारों के बे काबू जोशीले रंग से मुझ को तो हिन्दुस्तान में ख़तरा महसूस हो रहा है,कभी उसकी वजह से मुसलमानों का बड़ा नुक़्सान हो सकता है,और यह बे नतीजा नुक्सान होगा,और यह अन्ज़ाम से बे ख़बर लोग कभी भी कौम को दंगों और बलवों की आग में झोंक सकते हैं। कुछ जगह ऐसा हुआ भी है और कही  होते होते बच गया है।_

*( 📚मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 23,24 )*

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📋 ताज़ियेदारी लड़ाई झगड़े की बुनियाद......

 ࿐  _अभी चन्द साल पहले अख़बार में आया था कि तअज़िये दारों ने एक हिन्दू का आठ बीघा खेत रोन्द डाला बड़ी मुश्किल से पुलिस ने दंगे पर कन्ट्रोल किया, दर असल यह सब मुसलमानों को तबाह व बरबाद कराने वाले काम हैं।_

࿐ _आम रास्तों को बन्द करने, सड़कों पर जाम लगाने में भी तअज़िये दारों को बहुत मज़ा आता है और वह ऐसा कर के बहुत खुश होते हैं और उसको बड़ा कमाल समझते हैं,हांलाकि इस्लामी नुक्ता-ए-नज़र से यह रिफाहे आम में मुदाख़लत है,अवाम की हक़ तल्फ़ी नाजाइज़ व गुनाह है।_
 
  *_हदीस पाक में है हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया!_*

    _जो जिहाद के लिये जाने वाला किसी गुज़रने वाले के लिये रास्ता तंग करे उसको जिहाद का सवाब नहीं!_

*📚मिश्कात बाब आदादुस्सफर सफ़हा 340*

_उलमा-ए-किराम ने भी इस हरकत के नाजाइज़ होने का फतवा दिया है। इस की तहकीक़ हमारी किताब बारहवही शरीफ़ जलसे और जुलूस में देखे  मज़हब और धरम के नाम पर आज कल ऐसा बहुत किया जा रहा है।

*( 📚मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 24,25 )*

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📋 ताज़ियेदारी लड़ाई झगड़े की बुनियाद......

࿐  मज़हब मख़लूक़ की मुश्किलात को दूर करने का नाम है उन्हें परेशान करना और मुश्किलात में डालना मज़हब नहीं हैं, जब सड़के जाम होती हैं तो किस किस को कैसी मुसीबत और परेशानी का सामना करना पड़ता है ये सबको ख़ूब पता है, लेकिन धर्म के ठेकेदारों का धर्म आज कल उस वक़्त तक मुकम्मल नहीं होता जब तक कि वो पब्लिक का खून न पी लें।_

࿐ _दूसरे लोग अपने धर्मों के नाम पर क्या करते हैं उसके ज़िम्मेदार तो वो हैं लेकिन हमें उनकी शरीकी नहीं करना चाहिए, और अपने मज़हब की असली शक़्ल दुनियां के सामने लाना चाहिए, हमारे मज़हब में किसी को सताने की कोई गुंजाइश नहीं, रहगुजर तंग करना या बन्द करना या राहगीरों, मुसाफिरों को परेशान करना बड़ा ज़ुल्म व ज़्यादती है। इमाम हुसैन के मानने वालों को तो ऐसा कभी भी नहीं करना चाहिए, क्योकि उन्होंने दूसरों को यज़ीदी मज़ालिम से बचाने के लिए ही अपना गला कटाया था और आप उनका नाम लेकर ही दूसरों पर ज़ुल्म करते हैं और उनके लिए मुसीबत बन जाते हैं।

*📚मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 25,27*

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 📋 ताज़ियेदारी लड़ाई झगड़े की बुनियाद......

࿐ कुछ लोग कहते हैं कि ताज़ियादारी अगर हराम है तो मौलवी पहले भी तो थे उन्होंने मना क्यों नहीं किया, तो मेरे भाइयों! बात ये है कि ताजियेदारी शुरू होने के बाद धीरे धीरे नाजाइज़ कामों पर मुश्तामिल होती चली गई और जब से ये ख़िलाफ़े शरअ हरकात व खुराफ़ात का मजमुआ बनी है, उलमा ए दीन बराबर उसको हराम कहते और लिखते रहे, जैसा कि आने वाले बयान से आपको मालूम होगा।_ 

࿐ _और हर ज़माने में मानने वाले भी रहे हैं और न मानने वाले भी, और मौलवी भी सब अल्लाह से डरने वाले नहीं होते मख़लूक़ से डरने वाले और लोगो की हां में हां मिलाने वाले कुछ मौलवी पहले भी रहे हैं, और अब भी हैं और आज के मस्जिदों के इमामों का किसी ख़िलाफ़े शरअ बात को देखकर कुछ न कहना कोई मअना नहीं रखता क्योकि इमामत तो अब नौकरी व गुलामी सी हो कर रह गई है, अगर एक आदमी भी नाराज़ हो जाए तो इमामत ख़तरे में पड़ जाती है। लेकिन फिर भी मेरी गुजारिश है कि हिम्मत से काम लेना चाहिए और सही बात लोगो को बताना चाहिए छुपाना नहीं चाहिए, अल्लाह तआला उनकी मदद फरमाता है जो उसके दीन की मदद करते हैं।_

࿐ _मौलवियों में आज कुछ ऐसे भी हैं जिन के पेट अल्लाह ने भर दिए हैं लेकिन ये बहुत ज़्यादा माल व दौलत शान व शौकत हासिल करने के लिए दींन को नुकसान पहुंचाते हैं गलत बयानी करते हैं हक़ को छुपाते हैं और ये नहीं जानते हैं कि इज़्ज़त व दौलत अल्लाह के दस्ते कुदरत में है, जिसे जब चाहे अता फरमाए ये मौत को भूल गए हैं लेकिन मौत इन्हें नहीं भूलेगी ।

*📚मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा ,26,27*

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 *📋 ताज़ियेदारी और क़ुरआन व हदीस*

࿐  _क़ुरआन करीम में है:- और उन लोगो से दूर रहो जिन्होंने अपने दीन को खेल तमाशा बना लिया और उन्हें दुनियां की ज़िंदगी ने धोका दे दिया है।_ _*(पारा-7, रुकू-14)*_

࿐ _और एक जगह फरमाता है:- जिन लोगो ने अपने दीन को खेल तमाशा बना लिया और दुनियां की ज़िंदगी ने उन्हें धोके में डाल दिया, आज उन्हें हम छोड़ देंगे जैसा उन्होंने उस दिन के मिलने का ख़्याल छोड़ रखा था, और जैसा वो हमारी आयतों से इन्कार करते थे।_ _*(पारा-8, रुकू-13)*_

_इन आयतों को आप ध्यान से पढ़ें तो आज की ताजियेदारी और उर्सों के नाम पर जो मेले ठेले नाच तमाशे और क़व्वालीयां हो रही हैं ये सब चीजें याद आ जाएंगी, और नज़रे इंसाफ कहेगी की वाक़ई ये वो लोग हैं जिन्होंने इस्लाम को तमाशा बना कर रख दिया और मज़हब को हंसी खेल की शक़्ल दे दी। ख़ुदा ए तआला तौफ़ीक़ दे इंसाफ को चाहिए कि मरने से पहले आँखे खोल ले और होश में आ जाए।_

࿐ _क़ुरआन करीम में जगह जगह अल्लाह तआला ने रंज व मुसीबत हादसात वगैरह पर सब्र करने का हुक्म दिया है न कि रोने पीटने चीखने पुकारने सीने कूटने और मातम करने का क़ुरआन मे मुसीबत और परेशानी पर सब्र करने से मुतअल्लिक़ आयतों को जमा किया जाए तो अच्छी खासी एक किताब तैयार हो जाएगी।_

_हदीस शरीफ़ में है रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया:- जो (मय्यत के ग़म में) गाल पीटे, गरेबान फाड़े, और ज़माना ए जाहिलियत की सी चीख़ व पुकार मचाये वो हम में से नहीं।_

*(सहीह बुखारी जि.1,स.173)*

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 27*

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࿐  _हुज़ूर की एक सहाबिया हज़रत उम्मे अत्तिया कहती हैं:- रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हम को नोहा करने से मना फरमाया।_

*(सहीह बुख़ारी, जि.2, स.726)*

࿐ _एक हदीस में है रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया:- अल्लाह अज़्ज़ व जल ने मुझ को ढोल बाजे और बांसुरियों को मिटाने का हुक्म दिया।_ 

*(मिशक़त स.318, किताबुलइमारत फ़सल सालिस)*

࿐ _उसके अलावा एक और हदीस में है हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते है:- "मेरी उम्मत में ऐसे लोग होंगे जो ज़िनाकारी, रेशम, शराब और ढोल बाजो को हलाल कर लेंगे_"
_इस हदीस से हुज़ूर ने ढोल बाजों को ज़िनाकारी शराब वगैरह के साथ शुमार फरमाया है।_

 *(सही बुख़ारी, जि.2, किताबुलअशरिबा स.837)*

࿐ _मशहूर सहाबी हज़रत जाफ़र तैयार रदियल्लाहु तआला अन्हु जंगे मूता में शहीद हुए, उनकी शहादत की ख़बर जब मदीना शरीफ़ में आई तो उनके घर वाले ग़म मनाने लगे 3 दिन तक के लिए हुज़ूर ने इजाज़त दी उस के बाद हुज़ूर उनके घर ख़ुद तशरीफ़ लाये और फरमाया:- आज के बाद मेरे मेरे भाई जाफ़र के लिए कोई न रोये।_

 *(मिशकात बाबूत्तरज्जल स.382)*

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 27,28)*

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࿐  एक हदीस पाक में हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया:- लोगो मे दो बातें काफिरों वाली हैं, किसी के नसब में तअन करना और मय्यत पर नोहा करना।_

 *_(सही मुस्लिम, जि.1, स.58)_*

࿐ _रहा हज़रत सय्येदिना अमीर हमज़ा की जंगे उहद में शहादत के बाद हुज़ूर के हुक़्म पर बनू अब्दुलअशहल की औरतों का ग़म मनाना या रोना तो उस वाकिए के उलमा ने कई जवाबात दिए हैं उन सबकी तफसील का यहाँ मौक़ा नहीं, मैं ताजियेदारों मातम व सीना पीटने वालों से पूछता हूँ कि क्या जंगे उहद की तारीख़ पर मदीने शरीफ में हर साल ये हुआ करता था? जंगे उहद के तकरीबन 7 साल तक हुज़ूर दुनियां में तशरीफ़ फरमा रहे किसी एक साल का वाकिया भी किसी हदीस में हो तो ज़रा बताये। इस हदीस से मौत व शहादत के बाद चंद दिन तक ग़म मनाना साबित हो सकता है लेकिन बार बार या हर साल तजदीदे हुजन का सुबूत नहीं। 

࿐ और मौत व शहादत के बाद चंद यानी 3 दिन ग़म मनाने की इजाज़त का ज़िक्र हम पहले ही कर चुके हैं, जंगे उहद से बापसी में मदीने शरीफ़ में जिन घरों के मर्द शहीद हुए थे वहाँ ग़म मनाये गए थे लेकिन उसके बाद किसी साल किसी ने ऐसा किया हो तो बताएं जब उहद की लड़ाई में शरीक रहने वाले सहाबा और उनके घर वाले तो 50 साल से भी ज़्यादा दुनियां में रहे होंगे। उनकी औलाद और मानने वाले तो आज भी हैं। क्या  कहीं जंगे उहद के शहीदों, ख़ासकर हज़रत अमीर हमज़ा की शहादत का ग़म मनाया जाता है?

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 29,30)*

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*📋 ताज़ियेदारी और उलमा-ए-अहले सुन्नत*

࿐ _कुछ लोग समझते हैं कि ताजियेदारी सुन्नियों का काम है और उसके रोकना, मना करना वहाबियों का।_ _हालांकि जब से ये ग़ैर शरई ताजियेदारी राइज़ हुई है किसी भी ज़िम्मेदार सुन्नी_ _आलिम ने उसे अच्छा नहीं कहा है।__हिन्दुस्तान में दौरे वहाबियत से पहले के आलिम व बुज़ुर्ग हज़रत_ *शाह अब्दुलअज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाहि तआला अलैहि लिखते है:-*यानी अशरा मुहर्रम में जो ताज़ियेदारी होती है गुम्बदनुमा ताज़िये और तस्वीरें बनाई जाती है ये सब नाजाइज़ है।_

 *(फतावा अज़ीज़िया, जि.1, स.75)*

*࿐  आला हज़रत मौलाना अहमद रज़ा खां बरेलवी रहमतुल्लाही तआला अलैहि* _जो इमाम अहले सुन्नत हैं जिनका फतावा अरब व अज़म में माना जाता है वो फरमाते हैं:-अब कि ताज़ियादारी उस तरीक़ा-ए-ना मरज़िया का नाम है क़तअन बिदअत व नाजाइज़ व हराम है"_

 *(फतावा रज़विया, जि.24, स.513, मतबूआ रज़ा फाउंडेशन लाहौर)*

_࿐  कुछ लोग कहते हैं कि ताज़िया बनाना जाइज़ है घुमाना नाजाइज़ है आला हज़रत ने उसका भी रद फरमाया और बनाने से भी मना फरमाया, वो लिखते हैं:-मगर उस नक़्ल में भी अहले बिदअत से एक मुशाबिहत और ताज़ियेदारी की तोहमत का खदशा और आइन्दा अपनी औलाद व अहले एअतिक़ाद के लिए इब्तिलाये बिदअत का अन्देशा है। लिहाज़ा रोज़ा-ए-अक़दस हुज़ूर सय्यदुश्शोहद की ऐसी तस्वीर भी न बनाएं"_

 *(फतावा रज़विया, जि.24, स.513)*

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 30,31*

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*📋 ताज़ियेदारी और उलमा-ए-अहले सुन्नत*

 ࿐ जो  जो लोग कहते हैं कि ताज़िया बनाकर अहले सुन्नत का काम है वो आला हज़रत की किताबों का मुताअला करें पचासों जगह उनकी किताबों में ताजियेदारी को नाजाइज़ व हराम और गुनाह लिखा है बल्कि पूरा एक रिसाला उसी बारे में तस्नीफ फरमाया हैं, जिसका नाम है_
*सय्यदी मुफ्तिये आज़म मौलाना शाह मुस्तफा रज़ा खां अलैहिर्रहमा फरमाते हैं:-* _"ताजियेदारी शरअन नाजाइज़ है" (फतावा मुस्तफ़विया, स.534, मतबुआ रज़ा एकेडमी मुम्बई)_
*सदरुश्शरीआ हज़रत मौलाना अमजद अली साहब आज़मी अलैहिर्रहमा* _ताजियेदारी और उसके साथ जगह जगह जो ख़िलाफ़े शरअ हरकात व बिदआत राइज़ हैं उनका ज़िक़्र करके लिखते हैं:-_
_"ये सब महज़ खुराफ़ात है उन सबसे हज़रत सैय्यदिना इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु ख़ुश नहीं हैं"
चंद लाइनों के आगे लिखते हैं:- "ये वाकिया तुम्हारे लिए नसीहत था और तुमने उसको खेल तमाशा बनालिया"_

*(बाहरे शरीअत, हिस्सा16,स.248)*

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 30,31,

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*📋 ताज़ियेदारी और उलमा-ए-अहले सुन्नत*

  हज़रत मौलाना शाह मुफ़्ती अजमल साहब सम्भली फरमाते हैं:-  अब चूंकि ताजियेदारी बहुत ममनूआत शरइया और उमूरे नाजाइज़ पर मुश्तामिल है, लिहाज़ा ऐसी सही नक़्ल भी नहीं बनानी चाहिए।_ 

*(फतावा अजमलिया, जि.4, स.15)*

࿐  *हज़रत मौलाना हशमत अली खां बरेलवी फरमाते हैं:-* 
_ताज़िये बनाना उन्हें बाजे ताशे के साथ धूम धाम से उठाना उनकी ज़ियारत करना उनका अदब और ताज़ीम करना, उन्हें चूमना, उनके आगे झुकना और आँखों से लगाना, बच्चों को हरे कपडे पहनना घर घर भीक मंगवाना, कर्बला जाना वगैरह वगैरह शरअन नाजाइज़ व गुनाह है।_ 

*(शमए हिदायत, हिस्सा-सोम, स.30)*

*फ़क़ीहे मिल्लत मुफ़्ती जलालुद्दीन साहब अमजदी फरमाते हैं:-*  _हिन्दुस्तान में जिस तरह के आमतौर पर ताज़ियादारी राइज़ है वो बेशक हराम व नाजाइज़ व बिदअत सय्यअह है।_

 *(फतावा फैज़ुर्रसूल, जि.2, स.563)*

࿐ *हज़रत मौलाना गुलाम रसूल सईदी लिखते हैं:-*  _"अपने सीने और चेहरे पर तमाचे लगाना, बाल नोचना, कपड़े फाड़ना, हाय हाय करना और चीख़ना चिल्लाना और वो तमाम काम करना जो शियों के यहाँ मातमे हुसैन के नाम पर किये जाते हैं ये सब काम हराम हैं।"_

 *(शरह सही मुस्लिम, जि.1, स.495)*

࿐  *बहरुलउलूम हज़रत मुफ़्ती अब्दुलमन्नान साहब फरमाते हैं:-* _"आजकल आमतौर से जो ताज़िये बनाते हैं, उसका बनाना और रखना इस सिलसिले में जो मरासिम अदा किए जाते हैं सब नाजाइज़ व हराम हैं।"_ 

*(फतावा बहरुलउलूम, जि.5, स.448

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 32,33*


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*📋 ताज़ियेदारी और उलमा-ए-अहले सुन्नत*

 ࿐  _यहाँ ये भी बात क़ाबिले ज़िक़्र है कि 1388 हिजरी में अब से तक़रीबन 50 साल पहले ताज़ियादारी के हराम व नाजाइज़ होने से मुतअल्लिक़ एक फ़तवा मरकज़े अहले सुन्नत बरेली शरीफ़ से शाइअ हुआ था जिस पर उस ज़माने के हिन्दुस्तान व पाकिस्तान के मुख़्तलिफ़ शहरों के 75 बड़े बड़े सुन्नी उलमा-ए-किराम ने दस्तख़त किये थे, सभी ने ताज़ियादारी के हराम और नाजाइज़ होने की तसदीक़ की थी, और वो फ़तवा उस ज़माने में पोस्टर की शक़्ल में शाइअ किया गया था, इस की तफसील उलमा ए किराम के नाम के साथ हज़रत मौलाना मुफ़्ती जलालुद्दीन साहब अलैहिर्रहमा की तस्नीफ़ "खुतबाते मुहर्रम" स.469 पर देखी जा सकती है, गोया की ताजियेदारी हराम होने पर सुन्नी उलमा का इत्तिफाक है। इस सब के होते हुए ये कहना कि ताज़ियादारी से रोकना वहाबियों का काम है, जिहालत, नादानी और नावाकिफी है।_

࿐ _कुछ लोग बअज बुज़ुर्गाने दीन और औलियाए किराम के नाम गिना कर ये प्रोपगंडे करते हैं कि फलां बुज़ुर्ग ताज़िया बनबाया फलां ने कंधा दिया फलां ने ताज़िये का इस्तक़बाल किया देख कर खड़े हो गए, ये सब गढ़ी हुई कहानियां है, अवाम को बरगलाने और बहकाने के लिए गढ़ रखी हैं, किसी भी मुस्तनद मोअतबर ज़िम्मेदार आलिम की लिखी हुई किताब में ऐसा कोई वाकिया नहीं है, दर असल ताज़ियादारी को जाइज़ कहने वालों को क़ुरआन व हदीस या आइम्मा किराम की किताबों से कोई सुबूत नहीं मिलता तो गढ़ गढ़कर हिक़ायते बयान करते हैं

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 33,34)*

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  *♻️ बरेली शरीफ़ की ताज़ियेदारी......

_👉 कुछ लोग ये भी कहते सुने गए हैं कि ताज़ियादारी अगर नाजाइज़ व हराम है तो बरेली शरीफ़ जहाँ आला हज़रत अहमद रज़ा खां बरेलवी पैदा हुए और रहे वहाँ ताज़ियादारी क्यों होती है, तो उनकी ये दलील सही नहीं। दुनियां में सब जगह सब तरह के लोग रहते हैं उलमा ए किराम की बातें मानने वाले भी हैं और न मानने वाले भी, फरमाबरदार भी हैं और नाफ़रमान भी, बरेली शरीफ़ में एक ताज़ियादारी ही नहीं बहुत से गलत काम होते हैं, शराब नोशी, जुएबाजी, सूदख़ोरी, नाच तमाशे, बदकारी बेहयाई, बेपर्दगी, सिनेमा और पिक्चर बाजी, तो क्या उन सब की ज़िम्मेदारी आला हज़रत के सर डाली जाएगी?_


_👉 उलमा ए किराम की ज़िम्मेदारी समझाना है दिल में डालना अल्लाह का काम है और ताक़त से रोकना अहले सल्तनत व हुक़ूमत का काम है, आला हज़रत तो आलिमे दीन और नाइबे रसूल हैं, नबियों और रसूलों के ज़माने में भी उनकी बस्तियों में बडी तादाद नाफ़रमान और सरकशों की रही है हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की बीवी और उनके बेटे और हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की बीवी की सरकशी और नाफ़रमानी का ज़िक्र तो ख़ुद क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फरमाया है, ख़ुद इमाम आली मक़ाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु के ज़माने में उनके साथ क्या किया गया कलमा पढ़ने वालों ने ही उन्हें कैसा धोका दिया, और जंग करके शहीद कर डाला और सारा कूफ़ा मुख़ालिफ़ बन गया, तो अगर बरेली शरीफ़ के कुछ लोग आला हज़रत के ख़िलाफ़ चलते हैं तो उसमें कौनसी नई बात है और कौनसा तअज़्जु्ब का मक़ाम है।

*#📕 मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 30

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   *♻️ बरेली शरीफ़ की ताज़ियेदारी......

_हाँ ये बताइये कि आला हज़रत ने कभी ताज़ियादारी को जाइज़ कहा हो या उसकी इजाज़त दी हो तो ये आप कभी साबित नहीं कर सकते, क्योंकि उन्होंने हमेशा उसकी मुख़ालिफत की, जो काम भी उनकी किताबों से ज़ाहिर है, और उनकी औलाद के किरदार, तरीक़ा-ए-कार से , खानवादे के हज़रात आज भी ताज़ियादारी के मुख़ालिफ़ हैं, इसमे न कभी शरीक़ होते हैं न उसे चंदा देते हैं, बल्कि उनसे जहाँ तक मुमकिन है रोकने की कोशिश करते हैं, और बरेली शरीफ़ में जो अहले सुन्नत के दारुलइफ्ता हैं उनमें से किसी भी दारुलइफ्ता से ताज़ियादारी के नाजाइज़ व हराम होने का फ़तवा आज भी आसानी से लिया जा सकता है, ताज़ियेदार फ़तवा तो कभी लेते ही नहीं और झूंठे प्रोपगंडे करते फिरते हैं।_

*#📕 मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 30-36*


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